शिवकालीन रणरागिनियों की स्मृतियों को जागृत करने वाला प्रेरणादायी समारोह

मुंबई। महाराष्ट्र की धरती पर जब-जब छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मरण किया जाता है, तब-तब उनकी वीरगाथा के साथ-साथ उन रणरागिनियों का भी उल्लेख होता है जिन्होंने संकट की घड़ी में स्वराज्य के लिए कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी। मातोश्री जिजाबाई, ताराराणी, येसूबाई, अहिल्याबाई, रायबागन जैसी स्त्रियां केवल प्रेरणास्रोत ही नहीं बल्कि इतिहास में स्त्रीशक्ति की अमिट पहचान हैं। इन्हीं स्मृतियों को जीवंत करने और नई पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास श्री शिवाजी ज्ञानपीठ इंटरनेशनल और मराठी साहित्य व कला सेवा ने संयुक्त रूप से किया। दादर स्थित श्री शिवाजी मंदिर नाट्यमंदिर में आयोजित यह वार्षिक समारोह भव्यता और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्वलन और वंदेमातरम् की स्वरधारा से हुई। इसके बाद विद्यार्थियों ने लोककला, नृत्य और गीतों के माध्यम से मराठी संस्कृति का सुंदर प्रदर्शन किया। दर्शक दीर्घा तालियों से गूंज उठी और माहौल में एक अलग ही ऊर्जा का संचार हुआ।

शिक्षा का असली उद्देश्य

इस अवसर पर प्रमुख अतिथि के रूप में प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक प्रवीण भोसले उपस्थित थे। विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “शिक्षा का उपयोग केवल डिग्री और प्रमाणपत्र प्राप्त करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका असली मूल्य तब है जब वह जीवन में और आपके पसंदीदा क्षेत्र में कर्तृत्व सिद्ध करने में सहायक बने।” उन्होंने शिवाजी महाराज के संदर्भ में कहा कि जब हम “शिवरायांचे आठवावे रूप, आठवावा प्रताप” कहते हैं, तो उनके साथ-साथ रणरागिनियों का भी स्मरण अवश्य होता है। जिजामाता का मार्गदर्शन, ताराराणी का नेतृत्व, येसूबाई का साहस और अहिल्याबाई की दूरदर्शिता — इन सबके कारण ही स्वराज्य की नींव मजबूत हुई। भोसले ने विद्यार्थियों से आवाहन किया कि वे इन आदर्श स्त्रियों से प्रेरणा लेकर हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करें और समाज में अपनी अलग पहचान बनाएं।

वीरता के अनुभव साझा

विशेष अतिथि के रूप में पहुंचे एनएसजी कमांडो नरेश पवार ने अपने सैन्य जीवन के अनुभव साझा करते हुए युवाओं को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि पठानकोट हमला हो या जम्मू-कश्मीर में आतंक विरोधी कार्रवाई, सीमा पार ऑपरेशन हो या पुंछ की चुनौतीपूर्ण स्थितियां—भारतीय सेना ने हमेशा साहस और रणनीति से उनका सामना किया। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि हाल ही में सफल हुए “सिंदूर ऑपरेशन” का नेतृत्व दो बहादुर महिलाएं कर रही थीं—कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह। उन्होंने कहा, “युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि शिक्षा का उपयोग केवल नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा और सेवा में भी किया जा सकता है। सेना में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि स्त्री-शक्ति किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है।”

वीर तानाजी मालुसरे सम्मान

समारोह का एक विशेष आकर्षण था “सुभेदार वीर तानाजी मालुसरे सम्मान पुरस्कार 2025” का वितरण। इस वर्ष यह सम्मान मराठी पत्रकार लेखक संघ, मुंबई के अध्यक्ष और प्रख्यात इतिहासकार रविंद्र मालुसरे को प्रदान किया गया। सम्मान स्वीकार करते हुए उन्होंने भावुक स्वर में कहा, “स्वराज्य केवल शिवाजी महाराज की नहीं, बल्कि शहाजी राजे और राजमाता जिजाऊ माँसाहेब की भी कल्पना थी। इसे वास्तविकता में बदलने के लिए शिवाजी महाराज ने अपार संघर्ष किया और संभाजी महाराज ने उसका विस्तार किया। हजारों मावलों ने अपनी आहुति देकर इस स्वप्न को साकार किया। मराठी समाज के लिए यह इतिहास केवल गौरव का विषय ही नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक है। इसलिए हमें कभी भी इसे भुलाना नहीं चाहिए।”

संस्थागत योगदान

श्री शिवाजी ज्ञानपीठ इंटरनेशनल और डॉ. गायकवाड इंस्टीट्यूट के कार्यों की चर्चा करते हुए संस्थान प्रमुख डॉ. हेमंतराजे गायकवाड ने कहा कि उनका उद्देश्य लड़कियों को बारहवीं कक्षा के बाद आत्मनिर्भर बनाना है। इसी विचार से उन्होंने डॉ. गायकवाड इंस्टीट्यूट की स्थापना की, जो आज पैरामेडिकल क्षेत्र में देशभर में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त कर चुका है। उन्होंने कहा, “कठोर अनुशासन और पारिवारिक वातावरण के कारण कई छात्राएं मुझ पर पिता जैसा विश्वास करती हैं। यह मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है। शिवाजी महाराज के विचारों और जीवन-कार्य को देश की हर भाषा में पहुंचाना मेरा संकल्प है और इसी उद्देश्य से श्री शिवाजी ज्ञानपीठ इंटरनेशनल की स्थापना की गई है।”

निबंध प्रतियोगिता में युवा प्रतिभाएं

समारोह के अंतर्गत आयोजित राज्यस्तरीय “शिवकालीन रणरागिनी निबंध प्रतियोगिता” के विजेताओं को भी सम्मानित किया गया। प्रथम स्थान पर रहे डॉ. अनुज अविनाश केसरीकर, मुंबई को 5,000 रुपये नकद पुरस्कार, द्वितीय स्थान पर प्रा. प्रशांत पुंडलिक शिरुडे, ठाणे को 3,000 रुपये, तृतीय स्थान पर सुमिता अभिषेक पवार, मुंबई को 2,000 रुपये प्रदान किए गए। इसके अतिरिक्त स्नेहल गोविंद चव्हाण (रत्नागिरी) और हिमांशु विजय शुक्ल (जळगांव) को प्रोत्साहन पुरस्कार स्वरूप 1,000 रुपये, सम्मानपत्र और पुष्पगुच्छ भेंट किए गए। विजेताओं के चेहरों पर उत्साह और गर्व झलक रहा था।

समारोह का संचालन मराठी साहित्य व कला सेवा के संस्थापक अध्यक्ष गुरुदत्त वाकदेकर, युक्ता गोठणकर और आरती लोखंडे ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में आर्णा सुर्वे, साक्षी निर्मल, गौरव गायकवाड, समीक्षा बिळीगुदरी और साहिल धाकतोडे ने विशेष मेहनत की।  पूरे आयोजन में यह स्पष्ट संदेश उभरकर सामने आया कि इतिहास केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है। वह हमारे जीवन और संस्कारों का हिस्सा है। शिवकालीन रणरागिनियों का साहस और त्याग आज की स्त्रियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं और नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक।

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