माहुल भूमि विवाद: ऐतिहासिक हक, पर्यावरण हनन और विकास की त्रिवेणी -तथ्यात्मक एवं तार्किक विश्लेषण

मुंबई के चेंबूर क्षेत्र में माहुल समुद्र तट की विवादित त्रिकोणीय भूमि, जिस पर एजिस लॉजिस्टिक्स टर्मिनल प्रस्तावित है, ने एक जटिल कानूनी, पर्यावरणीय और आर्थिक संघर्ष को जन्म दिया है। बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट (बीपीटी) और एजिस के बीच हुए आवंटन के खिलाफ दिवेचा परिवार ने अपने पुश्तैनी मालिकाना हक का दावा किया है, जिसे पुराने न्यायिक फैसलों से बल मिलता है। अपलोडेड दस्तावेजों के अलावा, अतिरिक्त सत्यापित तथ्यों (जैसे बॉम्बे खोती उन्मूलन अधिनियम 1949 का प्रभाव, बॉम्बे हाईकोर्ट के मैंग्रोव संरक्षण आदेशों की विस्तृत जानकारी, एनजीटी द्वारा एजिस पर लगाया गया जुर्माना और लीज की विशिष्ट डिटेल्स) को शामिल कर इस संपादकीय को और अधिक तथ्यात्मक बनाया गया है। यह “त्रिलोक विवेचना” विवाद को तथ्यात्मक साक्ष्यों के आधार पर प्रस्तुत करती है, जहां अतीत की विरासत, वर्तमान की चुनौतियां और भविष्य की आकांक्षाएं संतुलित हों।

 1. पारंपरिक अधिकारों का आयाम: न्यायिक रूप से स्थापित निजी स्वामित्व और बाद के कानूनों का प्रभाव

दिवेचा परिवार का दावा माहुल व आणिक गांवों की ज़मींदारी पर आधारित है, जो 1831 में ब्रिटिश ‘खोत प्रणाली’ के तहत मिली थी। यह दावा केवल मौखिक नहीं, बल्कि उच्च न्यायालय के फैसले द्वारा समर्थित है:

  1934 का ऐतिहासिक फैसला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया बनाम फरदून जेजीभाई दिवेचा’ (36 बॉम्बे लॉ रिपोर्टर 761) मामले में फैसला सुनाया था कि विवादित भूमि, जिसमें समुद्री तट (Foreshore) का क्षेत्र भी शामिल था, दिवेचा परिवार की निजी संपत्ति है। कोर्ट ने खोती ग्रांट को बॉम्बे लैंड रेवेन्यू कोड की सेक्शन 3 के तहत ‘एलियनेटेड लैंड’ माना, जो सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त था।

  1949 का बॉम्बे खोती उन्मूलन अधिनियम का प्रभाव: हालांकि 1934 का फैसला मजबूत आधार प्रदान करता है, लेकिन 1949 का अधिनियम (जो रत्नागिरि और कोलाबा जिलों में खोती टेन्योर को समाप्त करता है) ने इसकी वैधता पर सवाल उठाए हैं।

 अधिनियम की सेक्शन 3 के तहत खोती अधिकारों को एक्सटिंग्विश किया गया, और खोतों को केवल मुआवजा प्रदान किया गया, क्योंकि खोती मुख्य रूप से राजस्व संग्रह की व्यवस्था थी, न कि पूर्ण स्वामित्व। सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों (जैसे श्यामसुंदर टिकम शेट बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1969) ने पुष्टि की कि यह अधिनियम खोती से जुड़ी सभी हेरेडिटरी राइट्स को प्रभावित करता है।

 इसलिए, 1934 के फैसले की वर्तमान प्रासंगिकता की जांच आवश्यक है—क्या दिवेचा परिवार के दावे अब भी वैध हैं, या अधिनियम ने उन्हें रद्द कर दिया?

1970 का भूमि अधिग्रहण आदेश (BARC मामला): 1970 में, जब भारत सरकार ने एटॉमिक एनर्जी (BARC) के लिए इस क्षेत्र की भूमि (जिसमें सर्वे नंबर 72 और 185 के भाग शामिल थे) का अधिग्रहण किया, तब BPT ने फिर से B.P.T. Act, 1879 की धारा 28 के तहत स्वामित्व का दावा किया।

   तथ्य: स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर ने अपने आदेश में BPT के दावे को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि धारा 28 निजी संपत्ति पर लागू नहीं होती। अधिकारी ने मुआवजा राशि (कुल ₹78,714.08, जिसमें ब्याज शामिल) को BPT और दिवेचा परिवार के बीच विवाद के कारण L.A. Act 1894 की धारा 31(2) के तहत अदालत में जमा करने का आदेश दिया।

   तर्क: यह आदेश साबित करता है कि BPT उस समय भी अपनी ज़मींदारी सिद्ध नहीं कर पाया था और अधिग्रहण के बाद भी दिवेचा परिवार मुआवजे का हकदार बना रहा, क्योंकि भूमि निजी थी।

  वर्तमान एजिस साइट (M-2): दिवेचा परिवार का दावा है कि एजिस को आवंटित M-2 भूमि, पूर्व में न्यायिक रूप से स्वीकृत निजी foreshore/creek क्षेत्र (जैसे सर्वे नंबर 185 का भाग) का हिस्सा है। हाल की लीज डिटेल्स के अनुसार, एजिस का टर्मिनल प्लॉट नंबर 72, महुल विलेज, ट्रॉम्बे, मुंबई-400074 पर स्थित है, जो पुराने पिरपाउ बर्थ के निकट त्रिकोणीय प्लॉट है।

निष्कर्ष: न्यायिक साक्ष्य यह स्थापित करते हैं कि BPT का क्षेत्राधिकार उच्च ज्वार रेखा (HTL) तक सीमित था, और जिस भूमि पर वे दावा कर रहे हैं, वह दिवेचा परिवार के पुश्तैनी अधिकार क्षेत्र में आती है। हालांकि, 1949 अधिनियम के प्रभाव से दावों की पुनर्समीक्षा आवश्यक है।

 2. पारिस्थितिक आयाम: मैंग्रोव संरक्षण कानूनों का उल्लंघन

यह विवाद केवल संपत्ति के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि तटीय पारिस्थितिकी के गंभीर उल्लंघन से भी जुड़ा है।

  CRZ-I उल्लंघन: एनजीओ और कार्यकर्ताओं के अनुसार, एजिस टर्मिनल के निर्माण के लिए CTS नंबर 1 के तहत आने वाले CRZ-I ज़ोन (मैंग्रोव क्षेत्र) में लगभग 8,000 वर्ग मीटर भूमि का अवैध रूप से समतलीकरण किया गया है।

  हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना: यह कृत्य बॉम्बे हाईकोर्ट के मैंग्रोव संरक्षण आदेशों (2005 और 2018) का सीधा उल्लंघन है। 2005 के अंतरिम आदेश में कोर्ट ने मैंग्रोव क्षेत्रों पर हैकिंग, कंस्ट्रक्शन और डेब्रिस डंपिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया।

2018 के अंतिम आदेश में कोर्ट ने पूरे महाराष्ट्र में मैंग्रोव्स पर कंस्ट्रक्शन फ्रीज लगाया, प्राइवेट लैंड पर मैंग्रोव्स को सरकार द्वारा 18 महीनों में टेकओवर करने का निर्देश दिया, और मैंग्रोव डिस्ट्रक्शन को नागरिकों के फंडामेंटल राइट्स का उल्लंघन माना।

 इन आदेशों के तहत, सभी मैंग्रोव क्षेत्रों को CRZ-I माना गया है और मैंग्रोव के 50 मीटर बफर जोन में किसी भी निर्माण (सुरक्षा दीवार/बाड़ को छोड़कर) पर पूर्ण प्रतिबंध है।

  प्रशासनिक निष्क्रियता: विधायक के हस्तक्षेप और अतिक्रमण हटाने के आदेश के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यह संस्थागत विफलता को दर्शाता है, जहाँ विकास की महत्वाकांक्षा ने पर्यावरण संरक्षण और आपदा शमन (बाढ़-रोधी ढाल) को पीछे धकेल दिया है।

 अतिरिक्त तथ्य: 2020 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने एजिस समेत HPCL, BPCL और अन्य कंपनियों पर पर्यावरण उल्लंघनों के लिए 286 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया, जो महुल क्षेत्र में समान मुद्दों से जुड़ा था।

निष्कर्ष: यदि ऐतिहासिक हक और भूमि उपयोग के बीच सामंजस्य नहीं बैठाया गया, तो औद्योगिक विकास से मुंबई की तटीय सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी, जो किसी भी आर्थिक लाभ से अधिक हानिकारक है।

3. औद्योगिक आयाम: पारदर्शिता और स्थिरता की चुनौती

BPT ने अपने 2047 मास्टर प्लान के तहत एजिस लॉजिस्टिक्स को 11,904 वर्ग मीटर भूमि 30 वर्षीय लीज पर, कथित तौर पर ₹1 प्रति वर्ग मीटर की नाममात्र दर पर आवंटित की है।

यह प्लान मुंबई पोर्ट को मॉडर्नाइज करने, कार्गो हैंडलिंग बढ़ाने और राष्ट्रीय मारिटाइम इनिशिएटिव्स से जोड़ने का उद्देश्य रखता है।

  पारदर्शिता पर सवाल: एजिस, जो पहले अतुल ड्रग्स के नाम से जानी जाती थी, को दी गई यह न्यूनतम लीज दर सार्वजनिक पारदर्शिता पर प्रश्न उठाती है। एक ऐसी भूमि पर करोड़ों का निवेश (₹99 करोड़) करना, जिस पर निजी स्वामित्व का न्यायिक रूप से समर्थित दावा है, परियोजना की कानूनी स्थिरता को जोखिम में डालता है। हाल ही में (2025) एजिस ने पिरपाउ फैसिलिटी में 61,000 KL कैपेसिटी एडिशन के लिए 100 करोड़ का अतिरिक्त निवेश घोषित किया है।

 विकास का जोखिम: औद्योगिक विकास महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि इसकी नींव विवादित स्वामित्व और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन पर खड़ी होती है, तो यह अस्थिर सिद्ध होगा। BPT की लैंड लीज पॉलिसी में अक्सर टेनेंट्स के साथ विवाद होते हैं, जैसा कि हाल के मामलों में देखा गया।

निष्कर्ष: स्थायी विकास के लिए यह अनिवार्य है कि एजिस/BPT इस बात को सुनिश्चित करें कि भूमि का स्वामित्व सभी कानूनी चुनौतियों से मुक्त है और पर्यावरण संबंधी अनुपालन (विशेष रूप से मैंग्रोव बफर जोन) पूरी तरह से किया जा रहा है।

संतुलन ही एकमात्र मार्ग

माहुल विवाद अतीत के न्यायिक फैसलों, वर्तमान के पर्यावरणीय संकट और भविष्य की औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं का संगम है।

 कानूनी समाशोधन: सरकार और BPT को या तो दिवेचा परिवार के दावों का सत्यापन कर सम्मानपूर्वक समाधान करना चाहिए या 1934 के फैसले के खिलाफ वैध कानूनी आधार (जैसे 1949 अधिनियम) स्पष्ट करना चाहिए।

 पर्यावरण प्राथमिकता: मैंग्रोव क्षेत्रों को CRZ-I के तहत तत्काल सीमांकित किया जाना चाहिए और हाई कोर्ट के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कड़ी निगरानी तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।

 संयुक्त समिति: एक संयुक्त जांच समिति (जिसमें सरकार, BPT, दिवेचा परिवार, और पर्यावरण विशेषज्ञ शामिल हों) ही इस विवाद में पारदर्शिता ला सकती है।

संतुलन से ही शाश्वत प्रगति संभव है। मुंबई को केवल आर्थिक इंजन नहीं, बल्कि एक न्यायसंगत और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ शहर बनना होगा।

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