राम मंदिर स्टेशन पर जन्मा नवजात कूपर अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहा है

मुंबई के राम मंदिर रेलवे स्टेशन पर हुई एक मार्मिक और अप्रत्याशित घटना ने एक बार फिर महानगर की स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई को सामने ला दिया है। मंगलवार देर रात लोकल ट्रेन से सफर कर रही एक गर्भवती महिला को अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई। महिला अपने परिवार के साथ घर लौट रही थी, लेकिन दर्द असहनीय होने पर ट्रेन को राम मंदिर स्टेशन पर रोकना पड़ा। परिवार ने तुरंत रेलवे पुलिस, एंबुलेंस सेवा और आसपास के अस्पतालों से संपर्क साधने का प्रयास किया, किंतु मदद समय पर नहीं पहुंच सकी। हालात इतने गंभीर हो गए कि प्रसव में हर पल की देरी मां और बच्चे दोनों के लिए खतरा बन गई थी। ऐसे में वहां मौजूद एक राहगीर ने हिम्मत और सूझबूझ का परिचय देते हुए खुद ही प्लेटफॉर्म पर डिलीवरी कराने का साहस दिखाया। फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के किरदार ‘रैंचो’ की तरह उसने स्थिति को संभाला और अपनी एक महिला डॉक्टर मित्र से वीडियो कॉल के माध्यम से मार्गदर्शन लेकर प्रसव कराया। डॉक्टर ने फोन पर रियल-टाइम में आवश्यक निर्देश दिए, जिन्हें युवक ने पूरी जिम्मेदारी के साथ पालन किया। इस हिम्मती प्रयास के कारण महिला की जान तो बच गई, पर नवजात की हालत बेहद गंभीर बनी हुई है। फिलहाल बच्चे को विले पार्ले स्थित कूपर अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसे नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में रखा गया है।

अस्पताल सूत्रों के अनुसार, बच्चे के दिल में छेद पाया गया है और चेहरे में कुछ विकृतियां भी देखी गई हैं। डॉक्टरों का कहना है कि जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी या प्रसव के दौरान हुई किसी जटिलता के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई हो सकती है। फिलहाल शिशु की हालत स्थिर नहीं है और डॉक्टरों की एक विशेष टीम उसकी निगरानी में लगी हुई है। मां की स्थिति फिलहाल सामान्य बताई जा रही है और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। इस पूरी घटना ने न केवल आम नागरिकों को झकझोर दिया है, बल्कि मुंबई की स्वास्थ्य आपातकालीन सेवाओं की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

प्रत्यक्षदर्शी मंजीत ढिल्लों ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर घटना का विस्तृत विवरण साझा करते हुए बताया कि जब महिला को अचानक दर्द हुआ, तो उन्होंने और अन्य यात्रियों ने रेलवे हेल्पलाइन, 108 एंबुलेंस सेवा, और आसपास के निजी अस्पतालों से बार-बार संपर्क करने की कोशिश की। बावजूद इसके, न तो एंबुलेंस समय पर पहुंची, न ही किसी अस्पताल से तत्काल सहायता मिली। ढिल्लों ने कहा कि महिला के परिवार ने पास के एक अस्पताल में भी मदद की गुहार लगाई थी, लेकिन अस्पताल प्रशासन ने प्रसव कराने से मना कर दिया, यह कहकर कि सुविधाएं सीमित हैं और जोखिम नहीं लिया जा सकता। मजबूर होकर परिवार को ट्रेन में ही लौटना पड़ा और जब दर्द असहनीय हो गया, तब उन्हें स्टेशन पर उतरना पड़ा। तभी एक राहगीर युवक ने अपने मोबाइल फोन के माध्यम से अपनी परिचित डॉक्टर को कॉल किया और उसके निर्देशानुसार प्लेटफॉर्म पर ही सुरक्षित डिलीवरी कराई।

राहगीर का यह साहसिक कदम सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। लोगों ने उसकी हिम्मत की सराहना करते हुए उसे ‘रियल लाइफ रैंचो’ करार दिया। लेकिन इस प्रशंसा के बीच, शहर की आपात स्वास्थ्य सेवाओं की असफलता पर भी तीखे सवाल उठ रहे हैं। मुंबई जैसे महानगर में, जहां हर दिन लाखों लोग यात्रा करते हैं, वहां आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था की अनुपलब्धता किसी भी समय बड़ी त्रासदी का रूप ले सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक स्थानों पर बेसिक मेडिकल रेस्पॉन्स यूनिट्स और प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती बेहद जरूरी है। कई बार घटनास्थल से अस्पताल तक मरीज पहुंचाने में लगने वाले कुछ मिनट ही जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क तय कर देते हैं।

मुंबई महानगरपालिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अनौपचारिक रूप से बताया कि घटना की जानकारी मिलने के बाद मामले की प्राथमिक जांच शुरू की गई है। अधिकारी ने कहा कि रेलवे और मनपा मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं में मरीजों को तत्काल सहायता मिल सके। वहीं, कूपर अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ ने बताया कि नवजात की हालत बेहद नाजुक है, लेकिन डॉक्टर लगातार उसकी देखभाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों में प्राथमिक उपचार और जन्म के समय दी जाने वाली तत्काल चिकित्सा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, और थोड़ी सी देरी भी बच्चे के जीवन पर गहरा असर डाल सकती है।

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है उस व्यवस्था के लिए जो अक्सर कागजों पर तो मजबूत दिखती है, लेकिन जमीन पर उसका ढांचा चरमराता हुआ दिखाई देता है। महानगर मुंबई, जिसे देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है, वहां यदि एक गर्भवती महिला को समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिलती, तो यह चिंता का विषय है। यह सवाल अब केवल सरकारी तंत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक चेतना का भी हिस्सा बन गया है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसी स्थिति में आम नागरिक क्या करें, जब सिस्टम ही वक्त पर जवाब न दे सके?

राम मंदिर स्टेशन पर जन्मे इस नवजात की जिंदगी अब अस्पताल की मशीनों और डॉक्टरों की कोशिशों पर टिकी है। उसका हर सांस, हर धड़कन मुंबई की उस स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी एक कसौटी है, जो हर वर्ष अरबों रुपये के बजट के बावजूद आम जनता तक समय पर राहत नहीं पहुंचा पाती। यह मामला सिर्फ एक दर्दनाक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि आपात स्थितियों के लिए तैयार रहना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह घटना जिम्मेदार अधिकारियों को जगाने का काम करेगी, ताकि भविष्य में किसी और मां को प्लेटफॉर्म पर नहीं, बल्कि अस्पताल के सुरक्षित वार्ड में बच्चे को जन्म देने का अधिकार मिल सके।

Related posts

दोस्ती बनी दुश्मनी का कारण, 15 वर्षीय किशोर ने 17 साल के साथी की ली जान

उद्धव ठाकरे को लोकसभा में बड़ा झटका! छह सांसदों ने बनाया अलग गुट, शिंदे सेना में विलय की अटकलों से सियासत गरम

BEST कर्मचारियों की आर-पार की लड़ाई, आज से अनिश्चितकालीन आंदोलन का ऐलान