पुणे: बदलते राष्ट्रीय सुरक्षा परिदृश्य और नागरिक प्रशासन व सशस्त्र बलों के बीच बेहतर समन्वय की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए सदर्न कमांड के तत्वावधान में शिवनेरी ब्रिगेड द्वारा “सिविल–मिलिट्री फ्यूज़न ट्रेनिंग कैप्सूल–2025” के दूसरे संस्करण का शुभारंभ किया गया है। यह कार्यक्रम यशदा (यशवंतराव चव्हाण अकादमी ऑफ डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन) के सहयोग से महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) के प्रशिक्षु अधिकारियों के लिए आयोजित किया जा रहा है।
एक सप्ताह तक चलने वाले इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 144 एमपीएससी प्रशिक्षु अधिकारी भाग ले रहे हैं, जिनमें 108 पुरुष और 36 महिला अधिकारी शामिल हैं। इसके साथ ही भारतीय सेना के अधिकारी भी इस प्रशिक्षण में सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं। महिला प्रशिक्षुओं की उल्लेखनीय संख्या देश के प्रशासनिक ढांचे में बढ़ती विविधता और नेतृत्व में महिलाओं की मजबूत होती भूमिका को दर्शाती है।
इस प्रशिक्षण कैप्सूल का मुख्य उद्देश्य नागरिक प्रशासन और भारतीय सेना के बीच आपसी समझ, संस्थागत सहयोग, संयुक्त निर्णय क्षमता और बेहतर इंटरऑपरेबिलिटी को मजबूत करना है। कार्यक्रम के दौरान प्रशिक्षु अधिकारी सेना की कार्यप्रणाली, अनुशासन, मूल्य–व्यवस्था और नेतृत्व दर्शन से रूबरू हो रहे हैं। उन्हें यह भी समझाया जा रहा है कि आपदा, आंतरिक सुरक्षा, आपात स्थिति और विकासात्मक परियोजनाओं में सेना किस प्रकार नागरिक प्रशासन की मदद करती है।
प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न व्याख्यान, फील्ड विज़िट, सिमुलेशन अभ्यास और संवाद सत्र आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे सिविल सर्विस और सैन्य अधिकारियों के बीच व्यवहारिक अनुभवों का आदान–प्रदान हो सके। इससे भविष्य में संकट प्रबंधन, कानून–व्यवस्था, प्राकृतिक आपदा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में बेहतर तालमेल स्थापित करने में मदद मिलेगी।
सदर्न कमांड के जीओसी-इन-सी लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ (पीवीएसएम, एवीएसएम) ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम “सहयोग आधारित नेतृत्व का एक नया मानक स्थापित करता है और आने वाली चुनौतियों के लिए राष्ट्र की तैयारियों को और मजबूत बनाता है।” उन्होंने कहा कि प्रशासन और सेना के बीच मजबूत समझ देश की संप्रभुता, सुरक्षा और विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
यह सिविल–मिलिट्री फ्यूज़न ट्रेनिंग कैप्सूल भारत के शासन ढांचे को अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक रणनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह प्रशिक्षण विश्वास, टीम वर्क और साझा जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देता है, ताकि भविष्य के सिविल सर्वेंट और सैन्य अधिकारी एक समन्वित टीम के रूप में कार्य कर सकें।
कार्यक्रम से यह भी अपेक्षा की जा रही है कि इससे प्रशासनिक दक्षता, त्वरित निर्णय प्रक्रिया और संकट के समय संयुक्त प्रतिक्रिया क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा। आने वाले वर्षों में यह मॉडल सिविल–मिलिट्री सहयोग का एक आदर्श उदाहरण बनकर उभर सकता है, जो एकीकृत शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा को नई मजबूती प्रदान करेगा।