राजस्थान और गुजरात की धरती देवी शक्ति की उपासना से अनुप्राणित मानी जाती है। यहां स्थित शक्तिपीठ न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं के जीवंत साक्ष्य भी हैं। शक्ति उपासना की परंपरा को समझने के लिए 51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति से जुड़ी कथा को जानना आवश्यक है, जो माता सती और भगवान शिव से जुड़ी है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता जगदम्बिका ने राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में सती के रूप में जन्म लिया और भगवान शिव से विवाह किया। एक समय दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व’ नामक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र सहित अनेक देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा गया। यह अपमान सती सहन नहीं कर सकीं। नारद जी से यज्ञ का समाचार पाकर वे पिता के घर जाने को आतुर हुईं। भगवान शिव के मना करने के बावजूद सती यज्ञ स्थल पहुंचीं, जहां अपमान से आहत होकर उन्होंने देह त्याग दिया।
इस घटना से क्रोधित भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंग विभक्त कर दिए। जहां-जहां ये अंग गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इन्हीं में से कुछ महत्वपूर्ण शक्तिपीठ राजस्थान और गुजरात में स्थित हैं।
राजस्थान को पराम्बा शक्ति की आराधना की भूमि कहा जाता है। यहां देवी के दो प्रमुख शक्तिपीठ माने जाते हैं। पहला है मणिवेदिक शक्तिपीठ। मान्यता है कि यहां माता सती की कलाइयां गिरी थीं। इस शक्तिपीठ की शक्ति गायत्री और भैरव शर्वानंद माने जाते हैं। यह मंदिर पुष्कर सरोवर के निकट स्थित है। एक ओर पर्वत शिखर पर सावित्री देवी का मंदिर है, तो दूसरी ओर पहाड़ की चोटी पर स्थित गायत्री मंदिर को ही मणिवेदिक शक्तिपीठ माना जाता है।
राजस्थान का दूसरा प्रमुख शक्तिपीठ विराट शक्तिपीठ है। यहां माता सती के पैरों की अंगुलियां गिरने की मान्यता है। इस पीठ की शक्ति अंबिका और भैरव अमृत हैं। यह मंदिर जयपुर से लगभग 64 किलोमीटर दूर विराट नामक गांव में स्थित है। यहां महाभारत कालीन विराट नगर के अवशेष आज भी मिलते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार पांडवों ने अपने अज्ञातवास का अंतिम वर्ष यहीं बिताया था।
गुजरात में भी शक्ति उपासना की गहरी परंपरा है। यहां प्रभास शक्तिपीठ का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती के देह का उदर भाग गिरा था। इस शक्तिपीठ की शक्ति चंद्रभागा और भैरव वक्रतुंड माने जाते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार गुजरात के अर्बुदारण्यक्षेत्र में पर्वत शिखर पर सती के शरीर का एक भाग गिरा था, जिसे अरासुरी अंबाजी कहा जाता है।
गुजरात के जूनागढ़ क्षेत्र में गिरनार पर्वत के प्रथम शिखर पर स्थित देवी अंबिका का विशाल मंदिर इसी आस्था का प्रतीक है। लोकमान्यता है कि स्वयं जगजननी देवी पार्वती हिमालय से यहां आकर निवास करती हैं। राजस्थान और गुजरात के ये शक्तिपीठ आज भी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं और शक्ति उपासना की परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं।