मुंबई 1993 दंगा केस: तीन दशक बाद आरोपी बरी, सबूत पेश करने में सरकार नाकाम

मुंबई के 1993 सांप्रदायिक दंगों से जुड़े एक मामले में सेशन कोर्ट ने करीब तीन दशक बाद अहम फैसला सुनाते हुए 53 वर्षीय आरोपी आसिफ अली शेख को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभियोजन पक्ष हिंसा में आरोपी की सक्रिय भूमिका साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत के अनुसार, न तो प्रत्यक्ष साक्ष्य पेश किए गए और न ही परिस्थितिजन्य सबूतों की ऐसी कड़ी थी, जिससे आरोपी का अपराध से जुड़ाव सिद्ध हो सके।

यह मामला दिसंबर 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद मुंबई में भड़के व्यापक सांप्रदायिक दंगों से संबंधित है। इन दंगों में शहर के कई हिस्सों में भारी हिंसा, आगजनी और जान-माल का नुकसान हुआ था। करीब 33 साल बाद इस प्रकरण में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एम. बी. ओझा ने फैसला सुनाते हुए आसिफ अली शेख को हत्या, दंगा और गैर-कानूनी जमावड़े जैसे गंभीर आरोपों से मुक्त कर दिया।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी ने कथित रूप से अन्य आरोपियों के साथ मिलकर कोई गैर-कानूनी सभा या साजिश रची थी। न्यायालय के अनुसार, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि शेख ने हिंसा में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया। जज ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी की पहचान हिंसा में शामिल लोगों में से एक के तौर पर नहीं हो पाई।

सरकारी पक्ष के अनुसार, 12 जनवरी 1993 को वडाला (ईस्ट) इलाके में दो समुदायों के बीच दंगे भड़क उठे थे। आरोप था कि इस दौरान भीड़ ने घरों और फैक्ट्रियों पर पत्थर, सोडा की बोतलें, जलते हुए कपड़े के गोले और ट्यूबलाइट फेंकीं। हालात काबू में लाने के लिए पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया, लेकिन जब भीड़ तितर-बितर नहीं हुई तो पुलिस को हवा में फायरिंग करनी पड़ी। अभियोजन का दावा था कि पत्थरबाजी की घटनाओं में चार लोग घायल हुए थे और इसी सिलसिले में आसिफ अली शेख को गिरफ्तार किया गया था।

हालांकि, अदालत ने माना कि इन आरोपों को साबित करने के लिए पेश किए गए साक्ष्य अपर्याप्त थे। गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाए गए और कोई भी गवाह आरोपी की भूमिका को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं कर सका। अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

गौरतलब है कि इसी मामले में इससे पहले भी कई आरोपियों को राहत मिल चुकी है। कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2003 से 2023 के बीच सबूतों की कमी के चलते इस केस में कुल 14 आरोपियों को बरी किया जा चुका है। ताजा फैसले के साथ ही एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि 1993 के दंगों से जुड़े मामलों में जांच और अभियोजन की प्रक्रिया कितनी प्रभावी रही है।

इस फैसले को मुंबई दंगों से जुड़े लंबे समय से लंबित मामलों में एक और अध्याय के रूप में देखा जा रहा है, जहां समय बीतने के साथ सबूतों के अभाव ने न्यायिक प्रक्रिया को जटिल बना दिया।

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