पाकिस्तान में लोह मंदिर आम जनता के लिए खोला गया, भगवान राम के पुत्र लव से जुड़ा ऐतिहासिक धरोहर स्थल

लाहौर। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित ऐतिहासिक लोह (लव) मंदिर का संरक्षण कार्य पूर्ण होने के बाद इसे आम लोगों के दर्शन और भ्रमण के लिए खोल दिया गया है। लाहौर किले परिसर में स्थित यह मंदिर भगवान राम के पुत्र लव को समर्पित माना जाता है और धार्मिक के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वॉल्ड सिटी ऑफ लाहौर अथॉरिटी (WCLA) के अनुसार, लोह मंदिर के साथ-साथ दो अन्य प्रमुख धरोहर स्थलों का भी जीर्णोद्धार किया गया है। इनमें सिख काल का ऐतिहासिक हम्माम (स्नानागार) और महाराजा रणजीत सिंह का अथदारा पवेलियन शामिल है। यह संरक्षण कार्य आगा खान कल्चरल सर्विस-पाकिस्तान के सहयोग से संपन्न हुआ।

लोह मंदिर की संरचना और विशेषताएं
लाहौर किले में स्थित यह मंदिर आपस में जुड़े कई कक्षों का समूह है। खुले आकाश के नीचे बने इस परिसर में एक प्रमुख पूजा स्थल भी है। इसे लव या लावा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार लाहौर शहर का नाम भगवान राम के पुत्र लव के नाम पर पड़ा, जिसे प्राचीन काल में ‘लवपुरी’ कहा जाता था। वर्ष 2018 में मंदिर के कुछ हिस्सों का जीर्णोद्धार किया गया था, जबकि अब पूरे परिसर का संरक्षण कार्य पूरा कर लिया गया है।

WCLA की प्रवक्ता तानिया कुरैशी ने बताया कि इस परियोजना का उद्देश्य लाहौर किले की बहु-सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना और आम लोगों के सामने प्रस्तुत करना है। उन्होंने कहा कि किले परिसर में हिंदू और सिख मंदिरों से लेकर मुगल काल की मस्जिदें और ब्रिटिश दौर की इमारतें मौजूद हैं, जो यहां की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। संरक्षण कार्य में आधुनिक तकनीकों और विशेष संरक्षण विधियों का उपयोग किया गया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक मान्यताएं
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, यह मंदिर सिख साम्राज्य के काल में निर्मित माना जाता है। वर्तमान में यहां नियमित पूजा-अर्चना नहीं होती, बल्कि इसे एक ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने वनगमन के पश्चात अपने पुत्रों लव और कुश को शासन सौंपा था। माना जाता है कि लव ने पंजाब क्षेत्र पर शासन करते हुए लवपुरी को अपनी राजधानी बनाया, जो कालांतर में लाहौर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हालांकि, इस तथ्य का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलता, लेकिन लोककथाओं और ऐतिहासिक स्रोतों में इसका व्यापक उल्लेख मिलता है।

सिख काल में हुआ व्यापक संरक्षण
एक सिख शोधकर्ता के अनुसार, सिख शासनकाल (1799 से 1849) के दौरान लाहौर किले में लगभग 100 ऐतिहासिक स्मारकों का रखरखाव किया गया था, हालांकि समय के साथ इनमें से करीब 30 स्मारक नष्ट हो चुके हैं। लाहौर किले के सिख कालीन इतिहास को आम जनता तक पहुंचाने के उद्देश्य से WCLA ने अमेरिका में रहने वाले सिख इतिहासकार डॉ. तरुंजित सिंह बुटालिया से एक विशेष गाइडबुक तैयार करवाई है, जिसका शीर्षक Lahore Fort during the Sikh Empire रखा गया है।

डॉ. बुटालिया ने बताया कि लाहौर किला सिख समुदाय के लिए भावनात्मक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लगभग पांच दशकों तक सिख साम्राज्य की सत्ता का केंद्र रहा। उन्होंने यह भी कहा कि फारसी दरबारी दस्तावेज उमदत-उत-तवारीख के अनुसार उनके पूर्वज सिख दरबार में उच्च पदों पर कार्यरत थे, जिससे इस धरोहर स्थल का उनके लिए व्यक्तिगत महत्व भी जुड़ा हुआ है।

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