कोलीवाड़े–गांवठाण संकट में: मुंबई के मूल अब भी अधिकारों से वंचित


शहरी विकास और पुनर्विकास परियोजनाओं के बीच सिमटती पारंपरिक बस्तियां, सीमांकन और स्पष्ट नीति की मांग तेज

मुंबई। आज जिस मुंबई को दुनिया आर्थिक राजधानी के रूप में जानती है, उसकी नींव उन सात द्वीपों पर पड़ी थी जहां सबसे पहले बसने वाले समुदायों में कोली समाज प्रमुख था। समुद्र किनारे बसे कोलीवाड़े केवल बस्तियां नहीं, बल्कि मुंबई की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक हैं। मगर तेजी से बदलते शहरी परिदृश्य और विकास परियोजनाओं के बीच इन कोलीवाड़ों और गांवठाणों का अस्तित्व आज गंभीर संकट से गुजर रहा है।

इतिहासकारों के अनुसार 19वीं सदी में मुंबई में लगभग 49 कोलीवाड़े थे। गोविंद नारायण माडगांवकर की 1863 में प्रकाशित पुस्तक ‘मुंबईचे वर्णन’ और बाद में प्रकाशित अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों में इन बस्तियों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। उस दौर में कुलाबा, माझगांव, शिवड़ी, वरली, माहिम, सायन, धारावी, खार दांडा, जुहू, वर्सोवा, मढ, मनोरी, गोराई और उत्तन जैसे कोलीवाड़े समुद्र से जुड़े जीवन और मछली पकड़ने के पारंपरिक व्यवसाय के लिए प्रसिद्ध थे।

समय के साथ मुंबई का स्वरूप तेजी से बदला। ऊंची इमारतों, समुद्री मार्गों और बड़े विकास प्रकल्पों ने शहर की तस्वीर बदल दी, लेकिन इसके साथ ही कोलीवाड़ों की खुली जगहें सिकुड़ती चली गईं। कई स्थानों पर बिल्डरों और पुनर्विकास परियोजनाओं की नजर इन कीमती समुद्री जमीनों पर है। कुछ जगहों पर झोपड़पट्टी पुनर्वसन योजनाएं लागू करने की कोशिश भी की गई, जिसका स्थानीय निवासियों ने विरोध किया।

वरली कोलीवाड़ा के लोगों ने ऐसी योजना के खिलाफ आंदोलन किया, जबकि सायन कोलीवाड़ा में पुनर्विकास के बाद पारंपरिक स्वरूप काफी हद तक समाप्त हो चुका है। इसी तरह धारावी पुनर्विकास परियोजना और अन्य विकास योजनाओं के कारण कई पुराने कोलीवाड़ों का भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है।

सांस्कृतिक दृष्टि से भी इन बस्तियों का महत्व बेहद खास है। नारळी पूर्णिमा और होली जैसे पर्वों के दौरान कोली समाज की पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और सामूहिक उत्सव आज भी यहां की पहचान बने हुए हैं। नई पीढ़ी इन परंपराओं को जीवित रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन लगातार बदलते शहरी माहौल में यह चुनौती भी बढ़ती जा रही है।

मुंबई में कोलीवाड़ों के साथ लगभग 118 गांवठाण भी हैं, जहां पीढ़ियों से मूल निवासी परिवार रहते आए हैं। इसके बावजूद इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अब तक कानूनी रूप से घर बनाने या विस्तार करने का स्पष्ट अधिकार नहीं मिला है। महाराष्ट्र राज्य के गठन को छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस मुद्दे पर ठोस नीति का अभाव बना हुआ है।

शहर के विकास आराखड़े, तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजनाओं और गृहनिर्माण नीतियों में भी इन बस्तियों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। 1991 और बाद में 2034 के विकास आराखड़ों में भी कोलीवाड़ों और गांवठाणों के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं किए जा सके।

स्थिति यह है कि मुंबई महानगर क्षेत्र में करीब पांच लाख से अधिक लोग कोलीवाड़ों में रहते हैं, जबकि पूरे महाराष्ट्र में कोली समुदाय की आबादी लगभग 40 लाख बताई जाती है। इसके बावजूद यह समुदाय विकास नियंत्रण नियमों में स्पष्ट स्थान न मिलने के कारण असुरक्षा की स्थिति में जीवन बिता रहा है।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इन क्षेत्रों की सीमाएं स्पष्ट न होने के कारण नीति बनाना मुश्किल रहा है। हालांकि अब कोलीवाड़ों और गांवठाणों के सीमांकन की प्रक्रिया शुरू की गई है। लंबे समय से चल रहे संघर्ष और सामाजिक संगठनों के दबाव के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है।

हाल ही में मुख्यमंत्री Devendra Fadnavis ने नागपुर अधिवेशन में घोषणा की थी कि सीमांकन की प्रक्रिया पूरी होने तक कोलीवाड़ों और गांवठाणों में अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाई जाएगी। इससे इन क्षेत्रों के निवासियों को फिलहाल कुछ राहत मिली है।

कोली समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि हर चुनाव के दौरान उन्हें आश्वासन तो मिलता है, लेकिन जमीन पर ठोस परिणाम नजर नहीं आते। पीढ़ियों से बसे होने के बावजूद जमीन के मालिकाना हक और सुरक्षित आवास की गारंटी न मिलने से लोग लगातार असमंजस में जी रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि मुंबई के संतुलित विकास के लिए कोलीवाड़ों और गांवठाणों की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना उतना ही जरूरी है जितना आधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण। ऐसे में कोली समाज को उम्मीद है कि आने वाले समय में उनकी बस्तियों को कानूनी मान्यता और विकास योजनाओं में उचित स्थान मिलेगा, जिससे मुंबई की इस प्राचीन पहचान को सुरक्षित रखा जा सके।

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