
बिजली दरों में कटौती का वादा, लेकिन बढ़ोतरी की तैयारी: कांग्रेस ने सरकार से मांगा जवाब
मुंबई। राज्य के बिजली उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली देने के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के वादे पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता अतुल लोंढे ने आरोप लगाया है कि पांच वर्षों में बिजली दरों में 50 प्रतिशत कमी और पहले साल में 10 प्रतिशत कटौती का जो आश्वासन दिया गया था, उसकी जगह अब 16 प्रतिशत तक दर वृद्धि की तैयारी की जा रही है। उन्होंने इस पर मुख्यमंत्री से स्पष्ट जवाब देने की मांग की है।
तिलक भवन में आयोजित प्रेस वार्ता में अतुल लोंढे ने कहा कि भाजपा और मुख्यमंत्री की कथनी और करनी में स्पष्ट अंतर नजर आ रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि चुनाव के समय बिजली दरें घटाने और किसानों को कर्जमाफी देने की घोषणा की गई थी, लेकिन अब महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी (एमएसईडीसीएल) ने महाराष्ट्र विद्युत नियामक आयोग (एमईआरसी) के समक्ष 20 से 40 प्रतिशत तक दर बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। इस विषय पर नागपुर में जनसुनवाई भी आयोजित की जा चुकी है।
लोंढे ने आरोप लगाया कि दर वृद्धि का यह पूरा प्रयास कुछ बड़े निजी हितों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। उनका कहना है कि यदि बिजली दरें बढ़ीं, तो इसका सबसे अधिक असर आम उपभोक्ताओं और छोटे, मध्यम तथा लघु उद्योगों पर पड़ेगा। पहले से ही महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही जनता पर यह अतिरिक्त बोझ होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि पड़ोसी राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में बिजली काफी महंगी है। उनके अनुसार, गुजरात में घरेलू बिजली दर 3 से 5.2 रुपये प्रति यूनिट, कर्नाटक में 3.7 से 7.3 रुपये और तेलंगाना में 2 से 10 रुपये प्रति यूनिट के बीच है, जबकि महाराष्ट्र में यही दर 4.4 से 12.8 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच चुकी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब उत्पादन लागत लगभग समान है, तो महाराष्ट्र में दरें अधिक क्यों हैं।
लोंढे ने बताया कि एमईआरसी हर पांच साल में बहुवर्षीय दर निर्धारण (एमवाईटी) आदेश जारी करता है। नया आदेश 1 अप्रैल 2025 से लागू होना था और इसके लिए मसौदा जारी कर राज्यभर में जनसुनवाई भी की गई थी। विभिन्न औद्योगिक संगठनों और उपभोक्ताओं ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इसके बाद 28 मार्च 2025 को अंतिम एमवाईटी आदेश जारी किया गया, जिसे उद्योग और राज्य की आर्थिक वृद्धि के लिए अनुकूल माना गया था।
उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद एमएसईडीसीएल ने पुनर्विचार याचिका दायर की और 25 जून 2025 को बिना नई जनसुनवाई और बिना आपत्तियां आमंत्रित किए संशोधित आदेश जारी कर दिया गया। लोंढे के अनुसार यह प्रक्रिया संदिग्ध है और कानूनी रूप से चुनौती योग्य भी है।
इस मामले में विभिन्न संगठनों और सोलर परियोजना डेवलपर्स ने मुंबई उच्च न्यायालय में अपील की, जिसके बाद अदालत ने महावितरण को फटकार लगाते हुए पुराने आदेश को लागू करने और दोबारा जनसुनवाई करने के निर्देश दिए।
लोंढे ने कहा कि महंगी बिजली दरों के कारण महाराष्ट्र देश के सबसे महंगे बिजली वाले राज्यों में शामिल हो गया है। इससे नए उद्योग राज्य में आने से हिचक रहे हैं और कई मौजूदा उद्योग अन्य राज्यों में जाने पर विचार कर रहे हैं, जिससे रोजगार पर भी असर पड़ सकता है।
उन्होंने बताया कि संशोधित आदेश से 20 से 40 प्रतिशत तक दर वृद्धि का प्रभाव लघु और मध्यम उद्योगों पर गंभीर रूप से पड़ेगा। महंगी बिजली से बचने के लिए कई एलटी और एचटी उपभोक्ताओं ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश किया था, जिसे 6 से 7 वर्षों में वापस मिलने की उम्मीद थी। लेकिन नए आदेश के कारण यह अवधि 4 से 5 वर्ष और बढ़ सकती है, जिससे बैंक ऋण चुकाना भी कठिन हो जाएगा।
लोंढे ने कहा कि पहले पीक आवर्स शाम 6 से 10 बजे तक होते थे, जिन्हें अब बढ़ाकर शाम 5 से रात 12 बजे तक कर दिया गया है। इससे सौर ऊर्जा का लाभ कम हो गया है, क्योंकि दिन में उत्पन्न अतिरिक्त बिजली का रात में समायोजन नहीं किया जाएगा।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब सौर ऊर्जा उत्पादन जरूरत से अधिक है, तो महावितरण पांच-पांच वर्षों के लिए थर्मल पावर के साथ बिजली खरीद समझौते क्यों कर रहा है। उन्होंने पूछा कि यदि सौर ऊर्जा से कंपनी की आय प्रभावित होती है, तो फिर 16,000 मेगावॉट की मुख्यमंत्री कुसुम योजना क्यों चलाई जा रही है। उनका सुझाव है कि इसी धन को ऊर्जा भंडारण प्रणाली पर खर्च किया जाए तो पीक समय में अधिक लाभ मिल सकता है।
लोंढे का दावा है कि सौर परियोजनाओं के कारण ट्रांसमिशन लॉस कम हुआ है और महावितरण को अतिरिक्त फायदा मिला है। दिन में उत्पन्न अतिरिक्त बिजली को अन्य उपभोक्ताओं को बेचकर भी लाभ कमाया जाता है, लेकिन इसका खुला उल्लेख नहीं किया जाता।
कांग्रेस की ओर से मांग की गई है कि 25 जून 2025 का संशोधित एमवाईटी आदेश तुरंत रद्द कर 28 मार्च 2025 का पूर्व आदेश फिर से लागू किया जाए। साथ ही सौर परियोजनाओं से होने वाली आय को सार्वजनिक किया जाए और राज्य सरकार तत्काल हस्तक्षेप कर नई जनसुनवाई आयोजित करे, ताकि उद्योगों और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की जा सके।