
डॉक्टरों की चेतावनी — घंटों बैठना, कम नींद और तनाव बन रहे ‘साइलेंट किलर’
मुंबई। सुबह बिना चीनी की चाय पी लेना या “शुगर-फ्री” बिस्किट खाना क्या सचमुच डायबिटीज से बचा सकता है? तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच यह सवाल आज करोड़ों लोगों के मन में है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि केवल चाय-कॉफी से चीनी हटाना डायबिटीज से सुरक्षा की गारंटी नहीं है। असली खतरा हमारी रोजमर्रा की आदतों, तनाव, खराब नींद और लगातार बैठे रहने वाली जीवनशैली से पैदा हो रहा है।
मुंबई के सैफी अस्पताल की एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. शहला शेख के अनुसार, डायबिटीज अब सिर्फ खानपान से जुड़ी बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि यह आधुनिक जीवनशैली का गंभीर परिणाम बनती जा रही है। उनका कहना है कि “लोग अक्सर सोचते हैं कि चीनी छोड़ देने से वे सुरक्षित हो गए, जबकि शरीर पर असर डालने वाले कई दूसरे कारण लगातार नजरअंदाज किए जा रहे हैं।”
ऑफिस कल्चर बढ़ा रहा खतरा
मेट्रो शहरों में कामकाजी लोगों की दिनचर्या तेजी से बदल रही है। सुबह से रात तक कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर काम करना अब सामान्य बात हो गई है। डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने से शरीर की ऊर्जा खपत कम हो जाती है।
शोध बताते हैं कि रोज कई घंटों तक लगातार बैठने वाले लोगों में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा लगभग 22 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर जब सक्रिय नहीं रहता, तब मांसपेशियां ग्लूकोज का सही उपयोग नहीं कर पातीं। इसका सीधा असर इंसुलिन पर पड़ता है और धीरे-धीरे इंसुलिन रेजिस्टेंस विकसित होने लगता है। यही स्थिति आगे चलकर डायबिटीज का रूप ले सकती है।
देर रात तक जागना भी खतरनाक
मोबाइल फोन, ओटीटी प्लेटफॉर्म और लगातार बढ़ते काम के दबाव ने लोगों की नींद छीन ली है। देर रात तक स्क्रीन देखने और पर्याप्त नींद न लेने की आदत शरीर के हार्मोनल संतुलन को प्रभावित करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कम नींद लेने से शरीर में इंसुलिन की कार्यक्षमता कमजोर पड़ती है और ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म बिगड़ने लगता है। इसका परिणाम ब्लड शुगर बढ़ने के रूप में सामने आता है। डॉक्टरों का कहना है कि नियमित रूप से 7 से 8 घंटे की नींद लेना शरीर के लिए बेहद जरूरी है।
तनाव बना बड़ा कारण
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक तनाव भी तेजी से बढ़ रहा है। नौकरी का दबाव, आर्थिक चिंताएं और व्यक्तिगत समस्याएं लोगों को लगातार तनाव में रख रही हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक तनाव में रहने पर शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है।
यह हार्मोन लिवर को ज्यादा ग्लूकोज बनाने के लिए प्रेरित करता है, जिससे रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार तनाव में रहने वाले लोगों में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में दो से तीन गुना तक अधिक हो सकता है।
‘शुगर-फ्री’ का भ्रम भी खतरनाक
बाजार में आजकल “शुगर-फ्री”, “डाइट” और “नो शुगर एडेड” नाम से कई उत्पाद बिक रहे हैं। लोग इन्हें सुरक्षित और हेल्दी मानकर बेझिझक इस्तेमाल करते हैं। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ऐसे कई उत्पादों में रिफाइंड मैदा, प्रोसेस्ड तेल और छिपी हुई कैलोरी मौजूद होती हैं, जो शरीर को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि केवल पैकेट पर लिखे “शुगर-फ्री” शब्द पर भरोसा करना सही नहीं है। इसके बजाय प्राकृतिक, ताजा और फाइबरयुक्त भोजन को प्राथमिकता देना ज्यादा जरूरी है।
बचाव के लिए अपनाएं ये आदतें
विशेषज्ञों के अनुसार डायबिटीज से बचाव के लिए केवल मीठा कम करना काफी नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। नियमित व्यायाम, हर घंटे थोड़ी देर टहलना, तनाव कम करना, पर्याप्त नींद लेना और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाना बेहद जरूरी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग समय रहते अपनी आदतों में सुधार करें, तो डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आज जरूरत सिर्फ चीनी कम करने की नहीं, बल्कि शरीर और जीवनशैली को संतुलित बनाने की है।