मुंबई। मुंबई की एक विशेष अदालत ने पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) से जुड़े बहुचर्चित 23,000 करोड़ रुपये के घोटाले के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इस मामले में पहली बार किसी आरोपी को अदालत ने बरी किया है। पीएनबी के पूर्व कार्यकारी निदेशक के. वी. ब्रह्माजी राव को सात वर्षों तक चली सुनवाई के बाद दोषमुक्त कर दिया गया। यह फैसला न केवल मामले में एक अहम मोड़ है, बल्कि सीबीआई की जांच पद्धति पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
सात साल बाद मिली राहत
के. वी. ब्रह्माजी राव पर आरोप था कि उन्होंने बैंकिंग प्रक्रियाओं और आरबीआई के दिशा-निर्देशों के अनुपालन में लापरवाही बरती, जिसके चलते नीरव मोदी और उसके सहयोगियों को कथित तौर पर धोखाधड़ी करने का अवसर मिला। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि महज पद पर आसीन होने या प्रक्रियागत विलंब होने मात्र से किसी को आपराधिक साजिश का हिस्सा नहीं ठहराया जा सकता। विशेष सीबीआई न्यायाधीश ए. वी. गुजराती ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि राव ने किसी तरह का आर्थिक लाभ प्राप्त किया या फिर सार्वजनिक हित की अनदेखी की। अदालत ने माना कि राव के खिलाफ आरोप न तो ठोस सबूतों से समर्थित हैं और न ही प्रथम दृष्टया किसी आपराधिक षड्यंत्र का संकेत देते हैं।
सीबीआई की जांच पर सवाल
फैसले में अदालत ने सीबीआई की जांच पर भी कठोर टिप्पणी की। न्यायाधीश ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि जांच एजेंसी ने चुन-चुनकर कुछ अधिकारियों को ही आरोपित किया, जबकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान स्तर पर शामिल अन्य अधिकारियों को छोड़ दिया गया। अदालत ने इसे न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया और कहा कि किसी एक व्यक्ति को अलग-थलग कर पूरी जिम्मेदारी डालना उचित नहीं है।
“हर शाखा पर नजर रखना असंभव”
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपी उस शाखा से सीधे तौर पर जुड़ा नहीं था, जहां धोखाधड़ी हुई। राव बैंक की हजारों शाखाओं की देखरेख कर रहे थे और ऐसे में प्रत्येक शाखा के लेन-देन पर व्यक्तिगत रूप से नज़र रखना मानव रूप से संभव नहीं है। न्यायाधीश ने कहा कि राव केवल पर्यवेक्षक की भूमिका में थे और उनका दायित्व नीति-स्तरीय था, न कि प्रतिदिन की शाखा-स्तरीय गतिविधियों का।
2018 की शिकायत में नाम नहीं
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2018 में जब भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने दिल्ली की एक मजिस्ट्रेट अदालत में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी, उस समय राव का नाम आरोपियों में शामिल नहीं था। बाद में सीबीआई ने उन्हें आरोपी बनाया। इसके विपरीत, पीएनबी की तत्कालीन प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी उषा अनंतसुब्रमण्यम, कार्यकारी निदेशक संजीव शरण और महाप्रबंधक नेहल अहद को शुरू से ही आरोपी बनाया गया था।
आपराधिक षड्यंत्र के आरोप निराधार
अदालत ने कहा कि किसी भी बड़े आपराधिक षड्यंत्र को साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि ठोस प्रयास, विचारों का मेल और साजिश का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किया जाए। इस मामले में अदालत को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह सिद्ध हो कि राव ने जानबूझकर किसी भी प्रकार से बैंक की आंतरिक नीतियों की अवहेलना की या अधीनस्थ अधिकारियों पर दबाव बनाया।
संवैधानिक अधिकार और निष्पक्ष प्रक्रिया
अदालत ने यह भी कहा कि राव के खिलाफ कार्यवाही जारी रखना “अनुचित उत्पीड़न” होगा, जो संविधान द्वारा प्रदत्त निष्पक्ष प्रक्रिया की गारंटी के विपरीत है। न्यायाधीश के अनुसार, सबूतों की अनुपस्थिति में ऐसे आरोप न केवल निराधार हैं बल्कि यह अभियोजन की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
ध्यान देने योग्य है कि नीरव मोदी और उसके सहयोगियों पर पंजाब नेशनल बैंक से कथित रूप से 23,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप है। यह मामला 2018 में सामने आया था और तब से ही देश-विदेश में इसकी गूंज रही है। नीरव मोदी वर्तमान में ब्रिटेन की जेल में बंद है और भारत सरकार उसके प्रत्यर्पण की कोशिश कर रही है। इस मामले में व्यक्तियों और कंपनियों समेत 25 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया गया था।
राव की बरी होने से यह मामला एक नए चरण में प्रवेश कर गया है। यह फैसला न केवल अभियुक्तों के लिए राहत की उम्मीद जगाता है, बल्कि जांच एजेंसियों के लिए भी यह एक संदेश है कि किसी भी मामले में पारदर्शिता और निष्पक्षता सर्वोपरि है। अदालत के इस निर्णय से यह भी स्पष्ट हो गया है कि न्याय केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों और निष्पक्ष प्रक्रिया के आधार पर ही दिया जा सकता है।
