मुंबई, जो भारत की आर्थिक राजधानी है, वहां लाखों झोपड़ीवासियों की जिंदगी आज भी अनिश्चितता के साए में जी रही है। झोपड़पट्टी पुनर्वास प्राधिकरण (एसआरए) की योजनाएं, जो मूल रूप से गरीबों को सम्मानजनक आवास प्रदान करने के लिए बनाई गई थीं, आज भ्रष्टाचार, उदासीनता और प्रशासनिक कमजोरियों की शिकार हो चुकी हैं। एसआरए के सीईओ महेंद्र कल्याणकर की हालिया पहलों की सराहना करनी चाहिए, जिनसे कुछ रुकी हुई योजनाओं को गति मिली है, लेकिन सच्चाई यह है कि ये प्रयास अपर्याप्त हैं। अधिकारियों की मिलीभगत और लापरवाही से डेवलपर्स समय पर परियोजनाएं पूरी नहीं कर रहे, जिससे सैकड़ों योजनाएं वर्षों से ठप पड़ी हैं। इससे न केवल गरीबों का विश्वास टूट रहा है, बल्कि मुंबई की शहरी विकास की नींव भी कमजोर हो रही है।
एसआरए की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मुंबई में कुल 2257 योजनाएं कार्यान्वित हैं, लेकिन इनमें से 517 रुकी हुई योजनाओं को दफ्तरी रूप से दर्ज किया गया है, जिनमें 2 लाख से अधिक झोपड़ीधारक प्रभावित हैं। इनमें से 273 योजनाओं से दोषी डेवलपर्स को हटाया गया है, और किराया बकाया 646 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है। महाराष्ट्र झोपड़पट्टी (सुधार, सफाई और पुनर्वास) अधिनियम, 1971 की धारा 13(2) के तहत 307 योजनाओं पर कार्रवाई हुई है, जिसमें 141 को विभिन्न संस्थाओं के साथ संयुक्त उद्यम (जेवी) में आगे बढ़ाया गया, जबकि केवल 39 के लिए नए डेवलपर्स सामने आए। 29 योजनाओं की सुनवाई अभी लंबित है, और 28 में पुराने डेवलपर्स लौट आए हैं। जून 2025 में 86 ठप परियोजनाओं के लिए नए डेवलपर्स नियुक्त करने का फैसला सराहनीय है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है? राज्य सरकार का पांच वर्षों में 5 लाख एसआरए घरों का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, जो पिछले 29 वर्षों के उत्पादन से दोगुना है, लेकिन बिना ठोस क्रियान्वयन के यह सिर्फ कागजी वादा ही रहेगा। सबसे दुखद पहलू पारदर्शिता की कमी है। एसआरए ने इन सभी जानकारियों को अपनी वेबसाइट पर जनता के समक्ष क्यों नहीं रखा? इससे असंतोष बढ़ रहा है और प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जानकारी उपलब्ध होने से प्रभावित परिवार बेहतर विकल्प चुन सकते थे। एमएमआर क्षेत्र में 228 लंबित योजनाओं को बीएमसी, एमएचएडीए और एमएमआरडीए जैसी संस्थाओं के साथ पुनर्जीवित करने का प्रयास अच्छा है, लेकिन जब तक वेबसाइट पर सभी 2257 योजनाओं की विस्तृत स्थिति अपलोड नहीं होती, ये प्रयास अधूरे ही रहेंगे।
डेवलपर्स पर कार्रवाई की कमी एक बड़ा मुद्दा है। एसआरए के पास डेवलपर्स को स्थायी रूप से काली सूची में डालने का स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है, जबकि जुलाई 2025 में प्रस्तावित संशोधनों में ब्लैकलिस्टिंग और सख्त दंड की बात की गई है। सितंबर 2025 में 33 डेवलपर्स को किराया न चुकाने पर हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन यह बहुत देर से आया। उधर, यदि कोई झोपड़ीधारक गलत प्रक्रिया का विरोध करता है, तो उसे ‘योजना-विरोधी’ ठहराकर धारा 33(ए) या 33/38 के तहत तुरंत कार्रवाई की जाती है। यह दोहरा मापदंड अन्यायपूर्ण है और पुनर्वास की मूल भावना को चोट पहुंचाता है। एक प्रभावित झोपड़ीवासी की बात सही है: “हमारा घर तोड़ दिया गया, लेकिन नया घर कब मिलेगा, इसका कोई हिसाब नहीं।” शिव श्रमिक कामगार संघटना के सरचिटणीस व श्रमिक सेना के पक्षप्रमुख संदीप मालतीदेवी त्रिलोकीनाथ शुक्ला का कहना है, “517 योजनाओं में सैकड़ों पर कार्रवाई हुई, लेकिन जेवी और नए डेवलपर्स की प्रक्रिया धीमी है। 1.85 लाख वासियों का भविष्य दांव पर है, और सरकारी वेबसाइट पर पूरी जानकारी न होने से विश्वासघात जैसा लगता है।”
सरकार की क्षमादान योजना और जेवी प्रयासों से कुछ आशा बंधती है, लेकिन पारदर्शिता के बिना ये अपूर्ण हैं। महाराष्ट्र हाउसिंग पॉलिसी 2025 में चुनौतियों का उल्लेख है, लेकिन क्रियान्वयन की कमी स्पष्ट है। एसआरए को डेवलपर्स के खिलाफ सख्त कानून बनाने चाहिए, और धारा 13(2) की लंबित 29 योजनाओं पर तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।
एसआरए की पहल सराहनीय हैं, लेकिन अधिकारियों की उदासीनता और कानूनी कमियां लाखों झोपड़ीवासियों को खतरे में डाल रही हैं। पारदर्शिता ही समाधान है – वेबसाइट पर पूरी जानकारी उपलब्ध कराएं, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाएं और न्याय सुनिश्चित करें। अन्यथा, मुंबई की झोपड़पट्टियां विकास की मुख्यधारा से दूर रह जाएंगी। सरकार और एसआरए को अब जागना होगा, वरना ये योजनाएं कागजों पर ही सिमट जाएंगी।
