भाजपा विधायक मिहिर कोटेचा ने जताया संदेह, बीएमसी प्रशासन से जांच की मांग
मुंबई। मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) द्वारा पूर्वी उपनगर मुलुंड में प्रस्तावित बर्ड पार्क (पक्षी उद्यान) परियोजना पर अब सवाल उठने लगे हैं। लगभग 166 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की निविदा प्रक्रिया बार-बार टलने से विवाद पैदा हो गया है। स्थानीय भाजपा विधायक मिहिर कोटेचा ने इस पर गंभीर संदेह जताते हुए महानगरपालिका प्रशासन को पत्र लिखकर पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि कुछ चुनिंदा ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए निविदा प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की जा रही है।
166 करोड़ की परियोजना पर अनिश्चितता का साया
मुलुंड पश्चिम के नाहुर गांव क्षेत्र में प्रस्तावित यह बर्ड पार्क मुंबईकरों के लिए एक नई पहचान बनने वाला था। यह पार्क न केवल मनोरंजन का केंद्र होगा, बल्कि इसमें स्थापित होने वाला विशाल पक्षी गृह (एवियरी) देश के सबसे बड़े पक्षी आवासों में से एक होगा। इस परियोजना की कुल लागत 166 करोड़ रुपये आंकी गई है।
नगरपालिका प्रशासन ने अगस्त के अंत में इस परियोजना के लिए निविदाएं जारी की थीं, लेकिन अक्टूबर समाप्ति की ओर होने के बावजूद प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो पाई है। लगातार मिल रही समय सीमा में बढ़ोतरी के कारण स्थानीय प्रतिनिधियों और नागरिकों के बीच सवाल उठने लगे हैं कि आखिर परियोजना को लटकाया क्यों जा रहा है।
विधायक कोटेचा ने उठाए गंभीर सवाल
भाजपा विधायक मिहिर कोटेचा ने बीएमसी आयुक्त भूषण गगराणी को भेजे पत्र में लिखा है कि बर्ड पार्क की निविदा प्रक्रिया में कई अनियमितताएं सामने आ रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि निविदा की समयसीमा दो बार बढ़ाई जा चुकी है और ऐसा प्रतीत होता है कि किसी “पसंदीदा ठेकेदार” को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए यह कदम उठाया गया है। कोटेचा ने यह भी कहा कि परियोजना से संबंधित भवन एवं रखरखाव विभाग के मुख्य अभियंता जानबूझकर निविदा को आगे बढ़ा रहे हैं, ताकि प्रतियोगी ठेकेदारों को बाहर किया जा सके। उन्होंने मांग की है कि इस विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर जांच की जाए और यदि आवश्यक हो तो निविदा प्रक्रिया किसी अन्य विभाग को सौंप दी जाए।
बर्ड पार्क का स्वरूप और योजना
प्रस्तावित बर्ड पार्क लगभग 17,958 वर्ग मीटर के भूखंड पर विकसित किया जाएगा, जिसमें से करीब 10,859 वर्ग मीटर क्षेत्र पक्षी गृह के लिए आरक्षित होगा। यह पार्क भायखला स्थित वीरमाता जिजाबाई भोसले वनस्पति उद्यान और प्राणीसंग्रहालय का एक उपकेंद्र होगा। योजना के अनुसार, यहां 18 दुर्लभ प्रजातियों सहित 206 प्रकार के पक्षी रखे जाएंगे। परियोजना के पूरा होने में दो वर्ष का समय लगने का अनुमान है। यह पार्क न केवल नागरिकों के लिए पर्यावरणीय शिक्षा का केंद्र बनेगा, बल्कि पक्षी संरक्षण और जैव विविधता के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। लेकिन मौजूदा विवाद के चलते यह सपना अधर में लटकता दिखाई दे रहा है।
निविदा में बार-बार देरी से बढ़ा संदेह
बर्ड पार्क की निविदा 29 अगस्त 2025 को जारी की गई थी, जिसकी अंतिम तिथि 19 सितंबर तय की गई थी। 10 सितंबर को हुई निविदा-पूर्व बैठक में नौ ठेकेदारों ने भाग लिया था। इसके बावजूद अब तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। कोटेचा का आरोप है कि चार सप्ताह बीत जाने के बाद भी बीएमसी ने ठेकेदारों द्वारा पूछे गए सवालों का कोई लिखित जवाब नहीं दिया और न ही बैठक का आधिकारिक विवरण सार्वजनिक किया गया। उन्होंने कहा कि निविदा की समयसीमा दो बार बढ़ाई गई है, जिससे करीब एक महीने की देरी हो चुकी है। यह स्थिति संदेह पैदा करती है कि कहीं किसी ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए यह रणनीति तो नहीं बनाई गई है।
पालिका प्रशासन की सफाई
बीएमसी प्रशासन ने कोटेचा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि निविदा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है। प्रशासन का कहना है कि निविदा को पहली बार पर्याप्त प्रतिसाद नहीं मिला, इसलिए 31 अक्टूबर 2025 तक निविदा प्रस्तुत करने की समयसीमा बढ़ाई गई है। यह निर्णय सक्षम अधिकारियों की मंजूरी से लिया गया है। बीएमसी ने यह भी कहा कि नागरिकों की सुविधा और प्रतिस्पर्धी माहौल को सुनिश्चित करने के लिए निविदा प्रक्रिया को अतिरिक्त समय दिया गया है, ताकि सभी योग्य ठेकेदारों को भाग लेने का समान अवसर मिल सके।
प्रोजेक्ट के भविष्य पर सस्पेंस बरकरार
हालांकि बीएमसी की सफाई के बावजूद मुलुंड बर्ड पार्क परियोजना को लेकर असमंजस बना हुआ है। निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठते सवाल और राजनीतिक दखल के आरोपों ने परियोजना को विवादों के घेरे में ला दिया है। यदि जांच में गड़बड़ी पाई जाती है, तो न केवल यह परियोजना और विलंबित हो सकती है, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग सकता है। मुलुंड के नागरिकों की उम्मीदें इस परियोजना से जुड़ी हैं — एक ऐसा हरित स्थल जहां शहरी बच्चे प्रकृति और पक्षियों के करीब आ सकें। लेकिन फिलहाल यह सपना निविदा की फाइलों में उलझा हुआ दिखाई देता है।
