मुंबई। राज्य की महायुति सरकार के कार्यकाल में स्थानीय निकायों में व्यापक स्तर पर वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ है। वित्त विभाग के स्थानीय निधि लेखा परीक्षण निदेशालय की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के विभिन्न स्थानीय निकायों में कुल 1,363 घोटालों का पता चला है, जिनके माध्यम से हजारों करोड़ रुपये का वित्तीय लेन-देन गायब हुआ बताया गया है। यह जानकारी निदेशालय की हालिया रिपोर्ट में दर्ज की गई है, जिसने शासन और वित्तीय तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन घोटालों और अनियमितताओं से संबंधित ऑडिट रिपोर्टें विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई हैं, जिससे जवाबदेही तय करने में कठिनाई उत्पन्न हुई है। वित्त विभाग के स्थानीय निधि लेखा परीक्षण निदेशालय का 2025-26 का अनुमानित बजट हाल ही में सदन के समक्ष रखा गया, किंतु इसके साथ यह तथ्य सामने आया कि राज्य में शहरी स्थानीय निकायों का लेखा परीक्षण पिछले दस वर्षों से अधूरा पड़ा हुआ है। वर्ष 2015-16 की ऑडिट रिपोर्ट अब तक पूरी नहीं की जा सकी है, जबकि उसके बाद के वर्षों की रिपोर्टें भी विलंबित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस स्थिति ने राज्य की वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वसनीयता की भावना को कमजोर किया है और उत्तरदायित्व तय करना कठिन बना दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में कुल 28,989 संस्थाओं का लेखा परीक्षण किया जाता है, जिसमें 145 नगर पंचायतें, 247 नगरपालिकाएं, 29 महानगरपालिकाएं, 34 जिला परिषदें, 351 पंचायत समितियां और 27,944 ग्राम पंचायतें शामिल हैं। इसके अलावा, 6 नगर निगम परिवहन उपक्रमों का भी ऑडिट इसी निदेशालय के अधीन होता है। यह निदेशालय 1930 के अधिनियम के तहत सार्वजनिक धन के उपयोग और व्यय की जांच करता है, ताकि वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। हालांकि, रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2014-15 के बाद की ऑडिट रिपोर्टें अब तक विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि पिछले एक दशक के दौरान स्थानीय निकायों और स्वायत्त संस्थाओं में हुए वित्तीय लेन-देन का कोई समुचित और पारदर्शी आकलन सार्वजनिक रूप से नहीं हो सका है।
वित्त विभाग की रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि वर्ष 2023-24 में मनी लॉन्ड्रिंग के कुल 1,392 मामले राज्य में सामने आए थे, जबकि सितंबर 2024-25 तक ऐसे 971 नए मामलों का पता चला है। इन मामलों में करोड़ों रुपये के गायब होने का संदेह जताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मामलों में अनियमित वित्तीय लेन-देन, ऑडिट की अनुपलब्धता और जवाबदेही की कमी ने राज्य की आर्थिक साख को प्रभावित किया है। हालांकि रिपोर्ट में किसी विशिष्ट व्यक्ति या संस्था का नाम नहीं दिया गया है, परंतु यह इंगित किया गया है कि स्थानीय स्तर पर वित्तीय अनुशासन का पालन नहीं हो रहा और शासन की निगरानी व्यवस्था में कई स्तरों पर खामियां बनी हुई हैं।
स्थानीय निकायों के अलावा, निदेशालय को कई प्रमुख संस्थानों के लेखा परीक्षण की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। इसमें महाराष्ट्र के चार कृषि विश्वविद्यालय, एक पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय और 228 अन्य विभिन्न शैक्षणिक व स्वायत्त संस्थान शामिल हैं। इस प्रकार, निदेशालय का कार्यक्षेत्र काफी व्यापक हो गया है, जो अब 28,989 संस्थानों तक विस्तारित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते कार्यक्षेत्र के बावजूद मानव संसाधन और तकनीकी ढांचे की कमी के कारण ऑडिट कार्य की गति प्रभावित हो रही है। परिणामस्वरूप, वित्तीय अनियमितताओं की पहचान में विलंब हो रहा है और कई मामलों में आवश्यक सुधारात्मक कदम समय पर नहीं उठाए जा सके।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वित्तीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि सभी स्थानीय निकायों की ऑडिट रिपोर्टें समय पर तैयार कर विधानमंडल के समक्ष रखी जाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से लंबित ऑडिट रिपोर्टें शासन की पारदर्शिता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं और जनविश्वास को कमजोर करती हैं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई स्थानीय संस्थाओं ने अपनी वित्तीय जानकारी समय पर प्रस्तुत नहीं की, जिससे ऑडिट प्रक्रिया में विलंब हुआ। निदेशालय ने सुझाव दिया है कि ऐसी संस्थाओं पर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की जाए और भविष्य में निधियों के उपयोग की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राज्य की वित्तीय व्यवस्था और स्थानीय निकायों के प्रशासनिक ढांचे को लेकर कई प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इतनी बड़ी संख्या में घोटालों और अनियमितताओं का उजागर होना शासन की निगरानी प्रणाली की कमजोरियों को दर्शाता है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, किंतु सूत्रों के अनुसार वित्त विभाग ने सभी संबंधित निकायों से विस्तृत जवाब और अद्यतन ऑडिट रिपोर्टें प्रस्तुत करने को कहा है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष इस ओर संकेत करते हैं कि राज्य में स्थानीय स्तर पर वित्तीय प्रबंधन के लिए एक अधिक सुदृढ़ और तकनीकी दृष्टि से सक्षम प्रणाली की आवश्यकता है। पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक निधियों के कुशल उपयोग के बिना शासन व्यवस्था में जनविश्वास स्थापित करना कठिन है। वित्तीय अनुशासन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि ऑडिट प्रक्रिया को समयबद्ध बनाया जाए, ऑडिट रिपोर्टों को सार्वजनिक किया जाए और जिम्मेदार अधिकारियों को उनके कार्य के लिए उत्तरदायी ठहराया जाए। रिपोर्ट ने यह भी सुझाव दिया है कि डिजिटल लेखा प्रणाली, स्वतंत्र ऑडिट समीक्षा बोर्ड और समय-समय पर वित्तीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय निकायों की दक्षता बढ़ाई जा सकती है।
कुल मिलाकर, लेखा परीक्षण निदेशालय की यह रिपोर्ट राज्य की वित्तीय व्यवस्था के भीतर छिपी गंभीर खामियों को उजागर करती है और यह दर्शाती है कि यदि समय पर पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित न किए गए तो स्थानीय प्रशासन की विश्वसनीयता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस रिपोर्ट में उजागर तथ्यों पर क्या कार्रवाई करती है और क्या वह स्थानीय निकायों की वित्तीय जवाबदेही को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाती है।
