शहापुर में स्वास्थ्य कर्मचारियों का थाली बजाकर आंदोलन किया तेज …35 हज़ार संविदा कर्मचारी स्थायीकरण की मांग पर अड़े

ठाणे ज़िले के शहापुर में राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियान के अंतर्गत काम करने वाले संविदा कर्मचारियों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ थाली बजाकर विरोध दर्ज कराया। यह आंदोलन राज्यभर में करीब 35 हज़ार कर्मचारियों द्वारा चलाए जा रहे बेमुदत आंदोलन का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत 19 अगस्त से हुई थी। कर्मचारियों का कहना है कि वे पिछले दस वर्षों से अधिक समय से लगातार सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक सरकारी सेवाओं में समायोजित नहीं किया गया है।

आंदोलन की पृष्ठभूमि

महाराष्ट्र की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा संविदा कर्मचारियों पर निर्भर है। इनमें चिकित्सा अधिकारी, नर्स, फार्मासिस्ट, स्वास्थ्य सेविकाएं और अन्य तकनीकी व गैर-तकनीकी कर्मचारी शामिल हैं। राज्य के उपकेंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, ग्रामीण अस्पतालों, उपजिला अस्पतालों और जिला अस्पतालों में ये कर्मचारी मरीजों की सेवा कर रहे हैं। औरंगाबाद खंडपीठ द्वारा 20 जून 2022 को दिए गए आदेश और 14 मार्च 2024 को जारी सरकारी निर्णय के अनुसार, 10 साल या उससे अधिक सेवा पूरी कर चुके संविदा कर्मचारियों का सरकारी सेवाओं में समायोजन होना चाहिए था। कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार ने इस निर्णय को लागू नहीं किया और 16 महीने बीत जाने के बावजूद उन्हें अनिश्चित स्थिति में छोड़ दिया है।

सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप

कर्मचारियों ने याद दिलाया कि दिसंबर 2012 में तत्कालीन विपक्ष के नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने संविदा कर्मियों को स्थायी नियुक्ति देने का वादा किया था। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है। उनका आरोप है कि सरकार ने उनके साथ अन्याय किया है और अब वे अपने हक़ के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हैं।

आंदोलन का स्वरूप

शहापुर तहसील में राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियान एकत्रीकरण समिति के नेतृत्व में संविदा कर्मचारियों ने थाली बजाकर विरोध जताया। यह प्रतीकात्मक आंदोलन सरकार की टालमटोल नीति पर सीधा हमला माना जा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

स्वास्थ्य सेवाओं पर असर

लगातार चल रहे आंदोलन का असर स्वास्थ्य सेवाओं पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। पिछले 15 दिनों से उपकेंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सरकारी अस्पतालों में कई आवश्यक सेवाएं प्रभावित हो चुकी हैं। इनमें आईसीयू, नवजात शिशु वार्ड, प्रसूति विभाग, टीकाकरण, क्षयरोग, कुष्ठरोग, कैंसर और मधुमेह जैसी सेवाएं शामिल हैं। स्टाफ की भारी कमी के कारण अस्पतालों में काम का दबाव बढ़ गया है। आम मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है और उन्हें निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। इससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है।

मरीजों की बढ़ी परेशानियां

ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को इस आंदोलन का सबसे अधिक खामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में सेवाएं बाधित होने के कारण उन्हें नज़दीकी निजी अस्पतालों में जाना पड़ रहा है, जहां इलाज महंगा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवा पर असर पड़ना चिंता का विषय है और सरकार को जल्द से जल्द इस मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए।

कर्मचारियों की मांगें

संविदा कर्मचारियों की मुख्य मांग यही है कि उन्हें स्थायी किया जाए और सरकारी सेवा का हिस्सा बनाया जाए। उनका कहना है कि वे वर्षों से स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ बने हुए हैं, लेकिन अस्थायी स्थिति में रहकर न तो नौकरी की सुरक्षा मिलती है और न ही उचित सुविधाएं।

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