मुंबई : पूर्वी उपनगर गोवंडी स्थित पंडित मदन मोहन मालवीय शताब्दी अस्पताल एक बार फिर चर्चा में है। खबर है कि इस अस्पताल और इससे जुड़े नवनिर्मित मेडिकल कॉलेज को निजी संस्था के हवाले करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। मनपा प्रशासन को तीन निजी संस्थाओं से अभिरुचि पत्र (EOI) प्राप्त हुए हैं, जिनमें से किसी एक का चयन किया जाएगा। इस कवायद के चलते शताब्दी अस्पताल का निजीकरण लगभग तय माना जा रहा है।
अस्पताल के निजी हाथों में जाने की आशंका से स्थानीय नागरिकों, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों में गहरा रोष है। उनका कहना है कि यह कदम गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों की पहुंच से स्वास्थ्य सेवाएं दूर कर देगा।
डेढ़ साल से चल रही तैयारी
सूत्रों के अनुसार, अस्पताल के निजीकरण की तैयारी पिछले डेढ़ साल से की जा रही थी। धीरे-धीरे डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों की संख्या घटाई गई, कई तकनीकी पदों पर नई भर्ती नहीं की गई। ईसीजी जैसे उपकरणों को प्रशिक्षित तकनीशियनों की बजाय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से चलवाया जा रहा है।
210 बिस्तरों की क्षमता वाला यह अस्पताल, जो कभी गोवंडी, मानखुर्द, चेंबूर और नवी मुंबई के गरीब वर्ग का सहारा था, अब केवल एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसा रह गया है। मरीजों का कहना है कि पहले जो सेवाएं मुफ्त में मिलती थीं, अब उन्हीं जांचों के लिए मोटी रकम वसूली जा रही है।
अस्पताल का विस्तार और निजीकरण की मंशा
मनपा ने हाल ही में अस्पताल की क्षमता बढ़ाकर 580 बिस्तर करने का निर्णय लिया है। नई संरचना में 390 सामान्य, 55 आईसीयू और 190 सुपर स्पेशियलिटी बिस्तरों की योजना है। इसी परिसर में मेडिकल कॉलेज भी शुरू किया जा रहा है। लेकिन जिस तरह यह परियोजना निजी संस्थाओं के हवाले करने की दिशा में बढ़ रही है, उससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह विस्तार वास्तव में जनहित में है या किसी निजी संस्था के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है।
“गरीबों के इलाज का हक छीना जा रहा है”
जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता मनोहर जरियाल ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा, “शताब्दी अस्पताल पूर्वी उपनगर के गरीब तबके के लिए जीवनरेखा है। एक बार इसका निजीकरण हो गया, तो गरीब मरीज इलाज के लिए दर-दर भटकेंगे।”
उन्होंने सवाल उठाया कि मुंबई मनपा का बजट देश के कई छोटे राज्यों से अधिक है, तो फिर अस्पतालों के रखरखाव के लिए फंड कहां जा रहा है? जरियाल ने चेतावनी दी कि निजी संस्था को अधिकार मिलने के बाद इलाज की दरें बढ़ेंगी और मुफ़्त सेवाएँ धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगी।
उनके अनुसार, “यह योजना स्वास्थ्य सुधार के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में सौंपने का प्रयास है। यह जनता के अधिकारों पर सीधा हमला है और इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
संगठनों और स्थानीय नागरिकों का विरोध
स्थानीय सामाजिक संगठन ‘संत गाडगे महाराज एक चलवल’ पिछले एक वर्ष से शताब्दी अस्पताल के निजीकरण के खिलाफ अभियान चला रहा है। संगठन के प्रतिनिधियों का कहना है कि अस्पताल जनता के पैसे से बना है, और इसे निजी हाथों में देना जनसेवा के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।
संगठन के युवा नेता राजेंद्र नगराले ने कहा, “हम इस मुद्दे पर सड़क पर उतरने को तैयार हैं। सभी राजनीतिक दलों से अपील की जाएगी कि वे इस आंदोलन में साथ आएं। जरूरत पड़ी तो हम रास्ता रोको आंदोलन करेंगे।”
नगराले ने यह भी कहा कि जब घाटकोपर का राजावाड़ी अस्पताल पूरे पूर्वी उपनगर की सेवा नहीं कर पा रहा, ऐसे में शताब्दी अस्पताल का निजीकरण क्षेत्र के लोगों के लिए स्वास्थ्य संकट खड़ा कर देगा।
जनता की उम्मीदें और प्रशासन की चुप्पी
मरीजों और कर्मचारियों का कहना है कि मनपा प्रशासन जानबूझकर सेवाएँ कम कर रहा है ताकि निजीकरण को सही ठहराया जा सके। कई महीनों से कई विभाग अधूरे हैं और उपकरणों की मरम्मत नहीं की जा रही है।
वहीं, मनपा की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। लेकिन स्थानीय जनता का कहना है कि अगर प्रशासन ने यह निर्णय वापस नहीं लिया, तो गोवंडी में बड़े आंदोलन की तैयारी की जाएगी।
शताब्दी अस्पताल कभी जनता की उम्मीदों का प्रतीक था। अब वही अस्पताल निजीकरण के खतरे से घिरा है। सवाल यह है कि क्या जनस्वास्थ्य की यह मशाल फिर से जनता के हाथों में लौटेगी, या किसी निजी संस्था के मुनाफे की मशीन बन जाएगी?