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दिवाली और पटाखे: परंपरा, इतिहास और बदलते संदर्भ, कब और कैसे बन गईं आतिशबाज़ी त्योहारों का हिस्सा

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-भारत में पटाखों की शुरुआत और दिवाली से जुड़ाव का इतिहास

– दीयों से रोशनी तक और आतिशबाज़ी तक का सफर

भारत में त्योहारों का स्वरूप सदियों से बदलता रहा है और समय के साथ इनमें कई नए तत्व भी जुड़े हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय तत्व है—पटाखे या आतिशबाज़ी। आज दिवाली का जिक्र आते ही रोशनी, मिठाइयों, पूजा-पाठ और पटाखों की गूंज की कल्पना अपने आप होने लगती है, लेकिन क्या हमेशा से ऐसा ही था? क्या प्राचीन भारत में दिवाली का उत्सव पटाखों के बिना ही मनाया जाता था? इस सवाल का उत्तर तलाशने पर इतिहास के पन्नों में कई रोचक तथ्य सामने आते हैं।

दरअसल, भारत में पटाखों का चलन बहुत पुराना नहीं है और यह देश की मूल सांस्कृतिक परंपराओं से नहीं बल्कि विदेशी प्रभावों और बारूद के आविष्कार से जुड़ा है। पटाखों की शुरुआत मूल रूप से भारत में नहीं बल्कि चीन में हुई थी। इतिहासकारों के अनुसार, लगभग 9वीं शताब्दी में चीन में बारूद की खोज हुई थी, जिसे ‘गनपाउडर’ के नाम से जाना जाता है। यह आविष्कार न केवल युद्ध और हथियारों के क्षेत्र में क्रांतिकारी साबित हुआ, बल्कि इसी की मदद से आतिशबाज़ी की भी शुरुआत हुई।

प्रारंभ में चीन में पटाखों का उपयोग बुरी आत्माओं को भगाने और उत्सवों में शोर-शराबे के लिए किया जाता था। धीरे-धीरे यह चलन चीन से होते हुए मंगोल आक्रमणों और सिल्क रूट जैसे व्यापार मार्गों के जरिए मध्य एशिया, अरब देशों और फिर भारत तक पहुँचा। भारत में पटाखों के पहले प्रमाण मध्यकालीन युग में मिलते हैं। इतिहास में दर्ज साक्ष्यों के अनुसार, 13वीं से 14वीं सदी के दौरान जब भारत में दिल्ली सल्तनत का शासन था और बाद में मुगल साम्राज्य का उदय हुआ, तब राजमहलों में आतिशबाज़ी का चलन शुरू हुआ। खासकर मुगल बादशाहों के दरबारों में खास मौकों, जैसे शादियों, विजय उत्सवों या त्योहारों पर रंग-बिरंगी आतिशबाज़ियाँ की जाती थीं। यह एक प्रकार का शाही प्रदर्शन था, जिससे राज्य की समृद्धि और शक्ति का प्रदर्शन होता था। बादशाह अकबर, जहांगीर और शाहजहां के शासनकाल में इस परंपरा को विशेष रूप से बढ़ावा मिला। मुगल महलों में आतिशबाज़ी के विशेष आयोजनों के वर्णन कई फारसी और हिंदी ग्रंथों में मिलते हैं।

ये आतिशबाज़ियाँ उस समय बेहद सीमित वर्ग के लिए थीं और इन्हें तैयार करना भी अत्यंत जटिल प्रक्रिया थी, क्योंकि बारूद और अन्य रसायन केवल सीमित मात्रा में उपलब्ध होते थे। दिवाली, जो कि मूलतः एक वैदिक परंपरा से जुड़ा पर्व है, अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन को भगवान राम के अयोध्या आगमन की स्मृति में मनाया जाता है, जब 14 वर्षों के वनवास के बाद उन्होंने रावण का वध करके विजय प्राप्त की थी। मान्यता है कि उस समय अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। उस काल में पटाखों का कोई उल्लेख नहीं मिलता, न ही प्राचीन ग्रंथों में इसका कोई वर्णन मिलता है। ऐसे में स्पष्ट है कि प्राचीन काल की दिवाली दीयों, पूजा और सामाजिक समागम तक सीमित थी। मुगलों के दौर में जब आतिशबाज़ी आम हो चली, तभी दिवाली जैसे लोकप्रिय त्योहारों में भी इसका समावेश होना शुरू हुआ। आरंभ में यह चलन भी राजदरबारों या उच्च वर्ग तक सीमित था, लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे तकनीकी प्रगति हुई और आतिशबाज़ी बनाने की विधि आम लोगों तक पहुँची, वैसे-वैसे यह आम जनता के त्योहारों का हिस्सा बन गई। विशेष रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल और उसके बाद के दशकों में आतिशबाज़ी का व्यावसायीकरण हुआ और दिवाली के साथ इसका संबंध और भी प्रगाढ़ होता गया।

आधुनिक समय में यह दृश्य आम हो गया है कि दिवाली की रात को दीपों की रोशनी के साथ-साथ आसमान रंग-बिरंगी रोशनी और तेज़ आवाज़ वाले पटाखों से गूंज उठता है। हालांकि बीते कुछ वर्षों में पटाखों के उपयोग को लेकर पर्यावरणीय दृष्टिकोण से गंभीर चिंताएँ सामने आई हैं। विशेष रूप से शहरी इलाकों में वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर, ध्वनि प्रदूषण और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों के कारण कई राज्य सरकारों और न्यायालयों ने पटाखों के उपयोग पर नियंत्रण की दिशा में कदम उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ग्रीन क्रैकर्स के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया है, जिनमें पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण होता है और यह पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं। इसके साथ ही कई सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने पटाखों की जगह दीपों, मोमबत्तियों, लाइटिंग और सामूहिक पूजा को प्राथमिकता देने की अपील की है।

वर्तमान में दिवाली का स्वरूप परंपरा और आधुनिकता के समन्वय का प्रतीक बन गया है। जहां एक ओर लोग अपने पूर्वजों की तरह दीप प्रज्वलित करके भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, वहीं दूसरी ओर आतिशबाज़ी और रोशनी के माध्यम से आधुनिक उत्सव का आनंद भी उठाते हैं। हालांकि समय की मांग है कि इस संतुलन में पर्यावरण की रक्षा को प्राथमिकता दी जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी दिवाली का यह पावन पर्व स्वच्छ, सुरक्षित और उल्लासपूर्ण वातावरण में मना सकें। इतिहास और संस्कृति का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि पटाखे भारत की मूल धार्मिक परंपराओं का हिस्सा नहीं थे, बल्कि यह समय के साथ जुड़े एक सांस्कृतिक तत्व हैं, जिन्हें अब जागरूकता और जिम्मेदारी के साथ अपनाने की आवश्यकता है।

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