डाला छठ पर मिनी बिहार बनी काशी, लाखों व्रतियों ने दिया अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य भक्ति, आस्था और अध्यात्म से सराबोर दिखी पूरी काशी, घाटों पर उमड़ा जनसैलाब

वाराणसी। लोक आस्था के महापर्व डाला छठ ने सोमवार को पूरी काशी को मिनी बिहार की छवि दे दी। गंगा तट से लेकर तालाबों, सरोवरों और नदियों के किनारे तक हर ओर श्रद्धा, भक्ति और आस्था की अनोखी झलक देखने को मिली। अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के लिए लाखों व्रती महिलाएं अपने परिवारजनों के साथ घाटों पर पहुंचीं। छठी मईया के गीतों और ढोल-मंजीरों की धुनों के बीच गूंजती आस्था की तरंगों ने पूरा वातावरण आध्यात्मिक बना दिया।

सुबह से ही श्रद्धालुओं ने घरों में पूजन की तैयारियां शुरू कर दी थीं। दोपहर होते-होते मोहल्लों से महिलाएं सिर पर दउरी में पूजा सामग्री लेकर अपने परिजनों संग गंगा तट की ओर रवाना हुईं। लाल, पीले और केसरिया परिधानों में सजी महिलाओं के गीतों से पूरा शहर गूंज उठा — “कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए” और “छठी मईया आइलें अंगनवा में” जैसे पारंपरिक गीत श्रद्धा का माहौल रच रहे थे।

ज्यों-ज्यों शाम ढली, गंगा तटों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। 36 घंटे के निर्जला व्रत के बाद महिलाओं ने गंगा जल में उतरकर भगवान सूर्य को पहला अर्घ्य अर्पित किया। जल में प्रतिबिंबित दीपों की झिलमिलाहट और आकाश में गूंजते भक्ति गीतों के बीच श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की दीर्घायु की कामना करते रहे।

शहर के प्रमुख घाटों — दशाश्वमेध, अस्सी, राजघाट, पंचगंगा, प्रह्लाद घाट, ब्रह्मा घाट, नमो घाट और गाय घाट — पर भक्तों की भारी भीड़ रही। दशाश्वमेध और अस्सी घाट पर तो तिल रखने की जगह नहीं बची थी। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी पारंपरिक परिधानों में सजे, एक ही भाव से छठी मईया को नमन करते नजर आए। घाटों पर मिट्टी की वेदियों पर व्रतियों ने हल्दी से शुभ प्रतीक बनाए, दीप जलाए और पूजन सामग्री के साथ सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया।

गंगा किनारे दीपों की कतारें झिलमिलाती रहीं। लहरों पर प्रतिबिंबित रोशनी और व्रतियों की भक्ति भावनाओं ने ऐसा दृश्य रचा कि लगा मानो काशी का हर कोना स्वयं प्रकाशमान हो उठा हो। छठ गीतों की धुनों ने घाटों को एकता और सामूहिकता का अद्भुत स्वरूप दे दिया।

सुरक्षा और व्यवस्थाओं में प्रशासन सतर्क
श्रद्धालुओं की अपार भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद दिखा। एनडीआरएफ और जल पुलिस की 11 टीमों के साथ गोताखोरों की तैनाती की गई थी। पुलिस, स्वयंसेवक और सफाईकर्मी लगातार तैनात रहे। घाटों पर बिजली की आपूर्ति, रोशनी, चिकित्सा सुविधा और लाउडस्पीकर की व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया गया।

शहर के बरेका क्षेत्र स्थित सूर्य सरोवर में भी श्रद्धा और आस्था का अनोखा संगम देखने को मिला। दोपहर बाद से ही महिलाएं पूजन सामग्री के साथ सरोवर की ओर उमड़ पड़ीं। शाम होते ही जैसे ही घड़ी में 4 बजकर 20 मिनट हुए, पूरा सरोवर भक्तों से भर गया। महिलाएं कमर भर पानी में खड़ी होकर भगवान भास्कर को अर्घ्य देने लगीं। परिजनों ने भी उनके साथ घुटनों तक जल में उतरकर सूर्यदेव से घर-परिवार की मंगलकामना की।

पूरे परिसर में भक्ति गीतों की गूंज थी। महिलाओं ने मंत्रोच्चार के साथ छठी मईया की आराधना की और भगवान सूर्य को नमन किया। “उग हे सूरज देव” की सामूहिक पुकार के साथ सरोवर का वातावरण श्रद्धा से भर उठा।

वरुणा नदी के शास्त्री घाट पर भी दिखी श्रद्धा की छटा
कचहरी क्षेत्र स्थित वरुणा नदी के शास्त्री घाट पर भी छठ पूजा की धूम देखने को मिली। घाट को फूलों, रंगोली और दीपों से आकर्षक ढंग से सजाया गया था। जैसे ही सूर्यास्त का समय नजदीक आया, महिलाएं सिर पर पूजा की दउरी लेकर घाट की ओर निकलीं। परिवारजन उनके साथ थे, और सबने मिलकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया।

यहां भी भोजपुरी भजनों और छठी मईया के गीतों ने श्रद्धालुओं को भक्ति रस में डुबो दिया। घाट के दोनों किनारों पर रोशनी और दीपों की पंक्तियों ने अद्भुत दृश्य रचा। बच्चे और युवा फोटो खींचते नजर आएं, जबकि बुजुर्ग शांत मन से प्रार्थना में लीन रहे।

पूरे आयोजन के दौरान पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी पारंपरिक परिधानों में नजर आए। किसी ने लाल साड़ी पहनी तो किसी ने पीले वस्त्रों में छठी मईया का गुणगान किया। घाटों पर दीपदान का दृश्य इतना भव्य था कि लगा जैसे धरती पर तारों का मेला उतर आया हो।

मिनी बिहार बनी काशी
डाला छठ का यह नज़ारा देखकर हर कोई यही कह रहा था कि काशी सचमुच “मिनी बिहार” बन गई है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले हजारों श्रद्धालु यहां हर साल की तरह इस बार भी उमड़े। अपने घरों से दूर रह रहे लोग भी इस पर्व को उसी पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मना रहे थे।

काशी की गलियों में “जय छठी मईया” के जयकारों के साथ गूंजती ढोलक और मंजीरे की थाप ने लोगों को अपने मूल से जोड़ दिया। घर-घर में प्रसाद की तैयारी, ठेकुआ और फलों की सोंधी खुशबू पूरे शहर में फैल गई।

भक्ति और सामूहिकता की झलक
डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामूहिकता और सामाजिक एकता का प्रतीक है। लोग एक-दूसरे की मदद करते, अर्घ्य के लिए जल भरते और प्रसाद बांटते नजर आए। घाटों पर उपस्थित सभी जाति-धर्म के लोग एक साथ श्रद्धा के इस सागर में डूबे दिखे।

मंगलवार तड़के उदयाचलगामी सूर्य को अर्घ्य के साथ होगा समापन
महापर्व का समापन मंगलवार तड़के होगा, जब व्रती महिलाएं सूर्योदय के समय उदयाचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देंगी। इसके साथ ही चार दिनों तक चलने वाला यह व्रत पूर्ण होगा। इस मौके पर घाटों पर फिर एक बार वही भक्ति, वही संगीत और वही सामूहिक उत्साह देखने को मिलेगा।

काशी की पवित्र धरती पर डाला छठ का यह पर्व न केवल धार्मिक अनुष्ठान का प्रतीक है, बल्कि यह इस बात का साक्षी भी है कि आस्था जब जन-जन से जुड़ती है, तो वह शहर को नहीं, पूरी संस्कृति को आलोकित कर देती है।

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