मुंबई—26/11 मुंबई आतंकवादी हमले की 17वीं बरसी से ठीक एक दिन पहले महाराष्ट्र सरकार ने मंगलवार, 25 नवंबर 2025, को बॉम्बे हाई कोर्ट को बताया कि इस मामले में बरी किए जा चुके फहीम अंसारी को किसी भी प्रकार का रोजगार या व्यवसाय चुनने की पूरी स्वतंत्रता है। सरकार ने स्पष्ट किया कि उन्हें ऐसे व्यवसायों के लिए पुलिस मंजूरी प्रमाणपत्र (पीसीसी) या चरित्र सत्यापन की आवश्यकता नहीं होगी, जिनमें इस प्रकार की अनुमति अनिवार्य नहीं है।
फहीम अंसारी ने जनवरी 2025 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पुलिस से आवश्यक मंजूरी देने की मांग की थी, ताकि वे अपनी रोज़ी-रोटी कमाने के लिए ऑटोरिक्शा चला सकें। अंसारी की दलील थी कि उनसे पुलिस मंजूरी प्रमाणपत्र का अधिकार छीनना “मनमाना, अवैध और भेदभावपूर्ण” है तथा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत आजीविका के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
सरकार ने पहले सितंबर 2025 में अदालत को सूचित किया था कि अंसारी का आवेदन 2014 के दिशानिर्देशों के तहत इसलिए खारिज किया गया था क्योंकि वे पहले लश्कर-ए-तैयबा के संदिग्ध संबंधों के चलते निगरानी सूची में थे। हालांकि, मंगलवार को अदालत में अतिरिक्त लोक अभियोजक अमित पालकर ने उन सभी नौकरियों की सूची पेश की जिनके लिए पुलिस क्लीयरेंस अनिवार्य है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन विशिष्ट नौकरियों को छोड़कर अंसारी किसी भी प्रस्तावित रोजगार या व्यापार को बिना पुलिस मंजूरी के कर सकते हैं।
पालकर ने प्रतिबंधित संगठन से अंसारी के कथित संबंधों पर आधारित एक गोपनीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत से मामले की सुनवाई ‘इन-चेंबर’ करने का अनुरोध किया। अदालत ने इस अनुरोध को मानते हुए कहा कि मामले की विस्तृत सुनवाई सप्ताह के अंत में की जाएगी।
फहीम अंसारी और सह-अभियुक्त सबाउद्दीन अहमद को मई 2010 में एक विशेष अदालत ने 26/11 हमले के संबंध में बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि दोनों के खिलाफ न तो किसी बड़ी साजिश में शामिल होने का सबूत है और न ही वे लश्कर-ए-तैयबा के सह-साजिशकर्ता के रूप में प्रमाणित होते हैं। यह बरी होने का आदेश बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने बरकरार रखा था।
हालांकि, अंसारी को उत्तर प्रदेश में एक पूरी तरह असंबंधित मामले में दोषी ठहराया गया था और उन्होंने 10 साल की सजा काटने के बाद 2019 में रिहाई पाई। रिहाई के बाद उन्होंने मुंबई और मुंब्रा स्थित प्रिंटिंग प्रेसों में काम किया, लेकिन स्थिर आय के लिए ऑटोरिक्शा चलाने का विकल्प चुना। जनवरी 2024 में उन्होंने लाइसेंस भी प्राप्त कर लिया था।
लेकिन जब उन्होंने पुलिस मंजूरी के लिए आवेदन किया, तब उन्हें आरटीआई के माध्यम से बताया गया कि उनके ‘कथित आतंकी संबंधों’ के कारण प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता। अंसारी ने इस कार्रवाई को मनमाना बताते हुए न्यायालय से इसका संज्ञान लेने की अपील की।
अब, राज्य सरकार के मंगलवार के इस बयान ने स्थिति को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया है। अदालत को यह आश्वासन दिया गया है कि जिन रोजगारों के लिए पुलिस मंजूरी की बाध्यता नहीं है, उनमें अंसारी को किसी भी प्रकार की रुकावट का सामना नहीं करना पड़ेगा। इससे उनकी आजीविका का रास्ता आसान होने की उम्मीद है।
मामले की अगली सुनवाई इस सप्ताह के अंत में होगी, जहाँ अदालत यह तय करेगी कि क्या अंसारी को ऑटोरिक्शा चलाने के लिए पुलिस मंजूरी से छूट दी जा सकती है, या फिर उनकी याचिका को किसी अन्य कानूनी आधार पर निपटाया जाएगा। फिलहाल, राज्य सरकार की प्रस्तुति ने अंसारी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कानूनी राहत के संकेत दिए हैं।