कल्याण-डोंबिवली में सत्ता समीकरण पर संकट, दलबदल की अटकलें तेज
मुंबई। महाराष्ट्र में नगर निगम चुनावों के परिणाम घोषित होने के बाद कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (केडीएमसी) राजनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बन गया है। यहां सामने आए घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के चार पार्षदों के रहस्यमय ढंग से लापता होने से सियासी हलचल तेज हो गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पार्टी की ओर से पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है।
16 जनवरी को घोषित नतीजों के बाद जहां अन्य नगर निगमों में सत्ता गठन की प्रक्रिया सामान्य रही, वहीं केडीएमसी में समीकरण लगातार बदलते नजर आ रहे हैं। 122 सदस्यीय सदन में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका। बहुमत का आंकड़ा 61 होने के बावजूद कोई भी पार्टी इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई।
कल्याण के सांसद श्रीकांत शिंदे के नेतृत्व वाला शिवसेना गुट 53 पार्षदों के साथ सबसे बड़ा दल बनकर उभरा, जबकि भारतीय जनता पार्टी 50 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। सत्ता गठबंधन और विपक्ष के बीच सीधा टकराव होने के बजाय, भीतरू राजनीति और आपसी खींचतान ने हालात को और जटिल बना दिया।
राजनीतिक समीकरणों में उस वक्त बड़ा मोड़ आया, जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राजू पाटिल ने अपने पांच पार्षदों का समर्थन शिंदे गुट को दे दिया। इससे शिवसेना (शिंदे) की संख्या बढ़कर 58 हो गई और वह भाजपा से आगे निकल गई, हालांकि बहुमत का आंकड़ा अब भी दूर बना रहा।
इसी बीच उद्धव ठाकरे गुट के चार पार्षदों के अचानक लापता होने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैला दी। शिवसेना (यूबीटी) ने इसे गंभीर मामला बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। साथ ही यह आशंका भी जताई जा रही है कि ये पार्षद शिंदे गुट में शामिल हो सकते हैं, जिससे सत्ता संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।
गौरतलब है कि चुनाव परिणामों के बाद पहले शिंदे गुट द्वारा अपने पार्षदों को संभावित दलबदल से बचाने के लिए होटलों में ठहराने की रणनीति अपनाई गई थी, जिसकी कड़ी आलोचना हुई थी। अब कल्याण-डोंबिवली में परिस्थितियां उलटती दिख रही हैं और राजनीतिक सरगर्मी एक बार फिर चरम पर पहुंच गई है।
अब सबकी नजर प्रशासनिक कार्रवाई, पुलिस जांच और आगामी राजनीतिक कदमों पर टिकी है, जो यह तय करेंगे कि केडीएमसी की सत्ता की चाबी किसके हाथ जाएगी।