जौनपुर। उत्तर प्रदेश और बिहार की पारंपरिक लोककला ‘लौंडा नाच’ पर आधारित फ़िल्म लौंडा नाच समाज के उस अनदेखे पक्ष को सामने लाती है, जो वर्षों से उपेक्षा और तिरस्कार का दंश झेलता रहा है। यह फ़िल्म केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि लोककला से जुड़े कलाकारों के संघर्ष, सामाजिक अस्वीकार और मानवीय गरिमा की लड़ाई को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है। कभी उत्सवों और मेलों की शान रहे ये कलाकार समय के साथ पहचान के संकट से जूझते नजर आते हैं, और यही यथार्थ फ़िल्म की कथा का केंद्र बिंदु है।
फ़िल्म का निर्देशन आशुतोष उपाध्याय ने किया है, जो बीते एक दशक से अधिक समय से भारतीय फ़िल्म उद्योग में सक्रिय हैं। धर्मा प्रोडक्शंस, ज़ी स्टूडियोज़ और पेन इंडिया जैसे बड़े बैनरों के साथ काम कर चुके उपाध्याय सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कहानियों को प्रभावशाली ढंग से परदे पर उतारने के लिए जाने जाते हैं। लौंडा नाच में भी उन्होंने यथार्थ और भावनाओं के संतुलन को सधे हुए अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।
छायांकन की कमान विजय मिश्रा ने संभाली है, जिनका अनुभव रक्तांचल, इंदौरी इश्क़ और धारावी बैंक जैसे चर्चित प्रोजेक्ट्स में देखने को मिला है। फ़िल्म की दृश्य संरचना लोककला की रंगीन परंपरा और कलाकारों के भीतर छिपे दर्द को समान प्रभाव के साथ उभारती है, जिससे दर्शक कहानी से भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है।
मुख्य भूमिका में युवराज पराशर नज़र आते हैं, जिन्होंने फैशन, डननो वाय और द पास्ट जैसी फ़िल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। उनके साथ इंदिरा तिवारी भी अहम किरदार में दिखाई देती हैं, जिन्हें गंगूबाई काठियावाड़ी में सशक्त अभिनय के लिए व्यापक सराहना और पुरस्कार मिले हैं। वरिष्ठ अभिनेता मनोज टाइगर, जिन्हें दर्शक ‘बताशा चाचा’ के नाम से पहचानते हैं, फ़िल्म को अनुभव और भावनात्मक गहराई प्रदान करते हैं। युवा कलाकारों में गणेश चव्हाण, विभा बाजपेयी सहित कई उभरती प्रतिभाएं फ़िल्म का हिस्सा हैं।
फ़िल्म के कार्यकारी निर्माता आलोक तिवारी हैं, जबकि सहायक निर्देशन की ज़िम्मेदारी श्रवण मकवाना और विभा बाजपेयी ने निभाई है। लौंडा नाच का निर्माण मूवी मस्ती मैजिक स्टूडियोज़, लाइटबॉय फ़िल्म्स और विष धुन के संयुक्त बैनर तले किया गया है।
निर्माताओं के अनुसार, यह फ़िल्म केवल एक लोककला की कहानी नहीं कहती, बल्कि पहचान, सम्मान, जेंडर परसेप्शन और समाज की सामूहिक स्मृति जैसे गंभीर मुद्दों पर संवाद स्थापित करती है। लौंडा नाच को समकालीन भारतीय आर्ट सिनेमा में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज़ के रूप में देखा जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में इसकी मजबूत उपस्थिति की संभावना जताई जा रही है।