Home राजनीतिराज्यउत्तर प्रदेशरंगभरी एकादशी के उपरांत मणिकर्णिका घाट पर भस्म होली, आस्था और अनूठी परंपरा का संगम

रंगभरी एकादशी के उपरांत मणिकर्णिका घाट पर भस्म होली, आस्था और अनूठी परंपरा का संगम

by trilokvivechana
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वाराणसी। रंगभरी एकादशी के अगले दिन काशी के ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट पर सदियों पुरानी परंपरा के तहत चिता भस्म से होली खेली गई। इस अद्वितीय आयोजन को देखने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं और साधु-संतों का सैलाब उमड़ पड़ा। आम दिनों में जहां यह घाट शोक और अंतिम संस्कार के कारण गंभीर माहौल में डूबा रहता है, वहीं इस विशेष अवसर पर वातावरण पूरी तरह बदला नजर आया। शहनाई की मधुर ध्वनि और हर-हर महादेव के उद्घोष से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान विश्वनाथ माता पार्वती का गौना कर उन्हें काशी लाते हैं। इसी के साथ होली पर्व की शुरुआत मानी जाती है। परंपरा है कि दोपहर के समय बाबा विश्वनाथ मणिकर्णिका तीर्थ पर मध्याह्न स्नान करने आते हैं। इस आस्था के चलते हजारों लोग घाट पर एकत्र हुए।

हालांकि इस वर्ष घाट पर चल रहे निर्माण कार्य के कारण सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। पुलिस बल की तैनाती और बैरिकेडिंग के चलते कई श्रद्धालुओं को ललिता और सिंधिया घाट पर ही रोक दिया गया। इससे कुछ लोगों में निराशा देखी गई, लेकिन दोपहर बाद सीमित संख्या में भक्तों को भस्म अर्पित करने और दर्शन का अवसर प्रदान किया गया।

मान्यता है कि स्नान के बाद बाबा अपने गणों के साथ महाश्मशान में चिता भस्म से होली खेलते हैं। जलती चिताओं के बीच खेली जाने वाली यह होली जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य का संदेश देती है। काशी की पहचान मानी जाने वाली यह परंपरा वर्षों से आस्था और आध्यात्मिक भाव के साथ निभाई जा रही है।

बाबा महाश्मशान नाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर पिछले 26 वर्षों से इस आयोजन को सुव्यवस्थित और भव्य रूप दे रहे हैं। उनके अनुसार, इस दिन देवता, गंधर्व और मनुष्य तो उत्सव में शामिल होते हैं, लेकिन बाबा के प्रिय गण भूत-प्रेत और अन्य अदृश्य शक्तियां आम जन से दूर रहती हैं। इसलिए शिव स्वयं महाश्मशान में आकर अपने गणों के साथ भस्म की होली खेलते हैं। यही क्षण होली पर्व के औपचारिक आरंभ का प्रतीक माना जाता है।

आयोजन के दौरान बाबा महाश्मशान नाथ और माता मशान काली की विधि-विधान से मध्याह्न आरती की गई। उन्हें मिष्ठान, सोमरस और गुलाल अर्पित किया गया। इसके बाद भस्म और रंगों के साथ होली खेली गई। देखते ही देखते मंदिर परिसर और शवदाह स्थल भस्म से ढंक गया।

इस वर्ष के आयोजन में अघोर साधु, नागा संन्यासी, किन्नर समाज और देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। सभी ने इस अनोखी परंपरा को श्रद्धा और विस्मय के साथ अनुभव किया। मणिकर्णिका घाट की भस्म होली यह संदेश देती है कि काशी में मृत्यु भी उत्सव का रूप ले लेती है और जीवन के गहन सत्य का बोध कराती है।

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