मुंबई। महानगर के प्रतिष्ठित नायर हॉस्पिटल डेंटल कॉलेज के छात्रावास में व्याप्त गंदगी और अव्यवस्था का मामला अब विधानसभा तक पहुंच गया है। हॉस्टल परिसर में कथित रूप से फैली अस्वच्छता, दुर्गंध और मूलभूत सुविधाओं की बदहाल स्थिति को लेकर भाजपा विधायक संजय उपाध्याय ने सदन में सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
मामले के अनुसार, बीते कुछ दिनों से छात्रावास में नियमित सफाई नहीं हो रही है। गलियारों और कमरों के बाहर कचरे के ढेर लगे हैं, शौचालयों की हालत खराब बताई जा रही है और परिसर में दुर्गंध फैलने की शिकायतें सामने आई हैं। इस स्थिति में करीब 200 से 300 छात्र, जिनमें इंटर्न डॉक्टर भी शामिल हैं, रहने को विवश हैं।
विधायक संजय उपाध्याय ने सदन में कहा कि यह केवल सफाई का मुद्दा नहीं, बल्कि छात्रों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा से जुड़ा गंभीर विषय है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी परिस्थितियों में संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ सकता है। साथ ही, लगातार अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहने से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक प्रदर्शन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
प्राथमिक जानकारी के मुताबिक, सफाई व्यवस्था ठप होने के पीछे ठेका कंपनी के कर्मचारियों को वेतन न मिलना एक प्रमुख कारण बताया जा रहा है। कर्मचारियों के काम बंद करने से छात्रावास की साफ सफाई पूरी तरह प्रभावित हुई है। इस पूरे प्रकरण में कॉलेज प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। विशेष रूप से प्रशासनिक अधिकारी डॉ. माला दीक्षित की कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष व्यक्त किया गया है। आरोप है कि निगरानी और समुचित समन्वय के अभाव में हालात बिगड़ते चले गए।
छात्रों और अभिभावकों ने मांग की है कि सरकार केवल तात्कालिक सफाई अभियान चलाकर मामले को शांत न करे, बल्कि स्थायी और जवाबदेह व्यवस्था सुनिश्चित करे। उनका कहना है कि छात्रावास में नियमित निरीक्षण, समय पर भुगतान व्यवस्था और पारदर्शी प्रशासनिक तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न उत्पन्न हो।
सदन में मुद्दा उठने के बाद स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा विभाग पर भी दबाव बढ़ गया है। विपक्ष और सत्तापक्ष के कुछ सदस्यों ने भी छात्रों के हित में त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता जताई है।
फिलहाल छात्रों की नजर सरकार और कॉलेज प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है। यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह मुद्दा और व्यापक रूप ले सकता है। महानगर के एक प्रमुख चिकित्सा शिक्षण संस्थान में इस तरह की स्थिति सामने आना व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।