नाशिक। भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन जीवन से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए विद्वानों ने कहा कि प्राचीन शास्त्र केवल संग्रहालय की वस्तु नहीं हैं, बल्कि उनके सिद्धांत आज भी समाज का मार्गदर्शन कर सकते हैं। समय की जरूरत है कि शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान को आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप समझा और अपनाया जाए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए नाशिक में तीन दिवसीय अखिल भारतीय शास्त्रार्थ महासभा एवं युवा विद्वत सम्मेलन का शुभारम्भ हुआ।
इस सम्मेलन का आयोजन केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के नाशिक परिसर तथा महर्षि गौतम गोदावरी वेदविद्या प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में किया गया है। उद्घाटन समारोह में अध्यक्षीय भाषण देते हुए आचार्य नीलाभ तिवारी ने कहा कि भारतीय शास्त्रों में निहित ज्ञान अत्यंत व्यापक और जीवनोपयोगी है। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक और नैतिक जीवन मूल्यों की भी शिक्षा दी जाती थी।
उन्होंने कहा कि इतिहास के विभिन्न कालखंडों में विदेशी आक्रमणों और बाद में अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के प्रभाव के कारण पारंपरिक शिक्षा पद्धति में बदलाव आया। धीरे-धीरे शिक्षा का स्वरूप ऐसा बन गया जिसमें परीक्षा और प्रमाणपत्र को अधिक महत्व दिया जाने लगा। परिणामस्वरूप शास्त्रीय ज्ञान की व्यावहारिक उपयोगिता पीछे छूटती चली गई। आचार्य तिवारी ने जोर देते हुए कहा कि आज आवश्यकता है कि शास्त्रों का गहन अध्ययन करने के साथ-साथ उनके सिद्धांतों को आधुनिक समाज की समस्याओं के समाधान में भी लागू किया जाए।
कार्यक्रम का उद्घाटन कैलास मठ के महामंडलेश्वर स्वामी संविदानंद सरस्वती के करकमलों से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की आधारशिला है। वेदों और उपनिषदों में निहित ज्ञान केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मानव जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने वाला है। उन्होंने कहा कि वेद मंत्रों के श्रवण और अध्ययन से मनुष्य के मन और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
स्वामी संविदानंद सरस्वती ने यह भी कहा कि वेदविद्या और संस्कृत के संरक्षण में गुरुकुलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। यदि समाज इन संस्थानों को सहयोग और समर्थन प्रदान करे, तो आने वाली पीढ़ियों तक यह महान ज्ञान परंपरा सुरक्षित और समृद्ध रूप में पहुंच सकती है।
उद्घाटन समारोह में कई प्रतिष्ठित विद्वान और गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। इनमें गोवा की श्रीविद्या पाठशाला के अध्यक्ष महामहोपाध्याय देवदत्त पाटील, आचार्य रवीन्द्र पैठणे, नाशिक शृंगेरी मठ के पदाधिकारी रामगोपाल अय्यर, विवेकानन्द केन्द्र के देवगिरी विभाग प्रमुख एवं वरिष्ठ संपादक डॉ विश्वास देवकर, उद्योगपति धनंजय बेळे, भाजपा प्रवक्ता लक्ष्मण सावजी, नगरसेवक गुरुमीत बग्गा, नीलम पाटील, चंद्रकला धुमाल और कमलेश बोडके सहित अनेक अतिथि शामिल थे।
इस सम्मेलन का महत्व इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2027 में नाशिक में होने वाले सिंहस्थ कुंभ मेला की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। इस पृष्ठभूमि में आयोजित यह विद्वत सम्मेलन कुंभ पर्व से जुड़े आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आयामों पर भी प्रकाश डालेगा।
तीन दिवसीय इस सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों से आए 50 से अधिक विद्वान भाग ले रहे हैं। वे व्याकरण, न्यायशास्त्र, मीमांसा, ज्योतिष, वेदान्त और धर्मशास्त्र जैसे पारंपरिक विषयों पर शास्त्रार्थ करेंगे। शास्त्रार्थ की यह परंपरा भारतीय विद्वत्ता की एक महत्वपूर्ण पहचान रही है, जिसके माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान और ज्ञान का विस्तार होता रहा है।
सम्मेलन के दौरान संस्कृत गुरुकुलों और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए विशेष संवाद सत्र भी आयोजित किए जाएंगे। इन सत्रों में युवा विद्यार्थी विद्वानों से सीधे प्रश्न पूछ सकेंगे और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त आगामी सिंहस्थ कुंभ मेले के धार्मिक महत्व, पूजा विधियों और विभिन्न अनुष्ठानों पर भी विस्तृत चर्चा की जाएगी, ताकि समाज में इस पर्व की आध्यात्मिक परंपरा के प्रति जागरूकता बढ़ सके।
उद्घाटन सत्र में आचार्य रवीन्द्र पैठणे ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि डॉ विश्वास देवकर ने सम्मेलन की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन डॉ कुमार भट्ट ने किया और अंत में डॉ विद्याधर प्रभल ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे। कार्यक्रम के संबंध में जानकारी देते हुए परिसर प्रभारी सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ रंजय कुमार सिंह ने बताया कि सम्मेलन के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि ज्ञान की यह समृद्ध विरासत भविष्य में भी जीवंत बनी रहे।