100 साल पुराने ड्रेनों का होगा कायाकल्प, मुंबई में ट्रेंचलेस तकनीक से बड़ा सुधार अभियान

मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी Mumbai में जलभराव की समस्या से निपटने के लिए बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने बड़ा कदम उठाया है। शहर के लगभग 100 वर्ष पुराने भूमिगत स्टॉर्म वॉटर ड्रेनों को आधुनिक तकनीक के जरिए मजबूत करने का व्यापक अभियान शुरू किया गया है। इस परियोजना के तहत “जियोपॉलिमर लाइनिंग ट्रेंचलेस तकनीक” का उपयोग किया जा रहा है, जिससे ड्रेनों की आयु कम से कम 50 वर्ष तक बढ़ने की उम्मीद है।

बीएमसी अधिकारियों के अनुसार, यह तकनीक बिना खुदाई के लागू की जा रही है, जिससे सड़क यातायात और आसपास के इलाकों में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती। इस प्रक्रिया में ड्रेनों के भीतर एक मजबूत परत तैयार की जाती है, जिससे पानी के प्रवाह की क्षमता बढ़ती है और भारी बारिश के दौरान जलभराव की समस्या को कम करने में मदद मिलती है।

हाल ही में उप आयुक्त (इन्फ्रास्ट्रक्चर) गिरीश निकम, प्रमुख अभियंता कल्पना राऊळ और अन्य अधिकारियों ने प्रिन्सेस स्ट्रीट स्थित शांतिनिकेतन आउटफॉल के पास चल रहे कार्यों का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने परियोजना की प्रगति और गुणवत्ता का जायजा लिया तथा इसे समयबद्ध तरीके से पूरा करने के निर्देश दिए।

मुंबई में कुल 621 किलोमीटर लंबी कमानी (आर्च) और बंदिस्त स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज प्रणाली है, जिसमें से 495 किलोमीटर हिस्सा शहर क्षेत्र में फैला हुआ है। हाल ही में किए गए सीसीटीवी सर्वेक्षण में कई जगहों पर दरारें, ईंटों का खिसकना, जोड़ कमजोर होना और छत के क्षतिग्रस्त होने जैसी गंभीर समस्याएं सामने आई थीं, जिससे इन ड्रेनों के पुनर्विकास की आवश्यकता और भी बढ़ गई।

बीएमसी ने पहले चरण में 27 ड्रेनों, जिनकी कुल लंबाई लगभग 14.2 किलोमीटर है, के पुनर्वसन का कार्य शुरू किया है। ये वे ड्रेन हैं, जो सबसे अधिक क्षतिग्रस्त पाए गए थे। इस परियोजना के लिए Indian Institute of Technology Bombay और Veermata Jijabai Technological Institute जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं से तकनीकी सलाह ली जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, जियोपॉलिमर लाइनिंग ट्रेंचलेस तकनीक का भारत में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है, जबकि विकसित देशों में यह तकनीक पहले से अपनाई जा चुकी है। बीएमसी का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, ऐसे में ड्रेनेज क्षमता को मजबूत करना बेहद आवश्यक हो गया है।

अधिकारियों का कहना है कि यह परियोजना न केवल जलभराव की समस्या को कम करेगी, बल्कि शहर की ड्रेनेज व्यवस्था को अधिक टिकाऊ, प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल भी बनाएगी। आने वाले मानसून से पहले इस कार्य को गति देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, ताकि मुंबईवासियों को राहत मिल सके।

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