छतरपुर में ‘चिता आंदोलन’ की ज्वाला तेजआदिवासी महिलाएँ बच्चों संग चिताओं पर लेटीं, केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ उग्र विरोध

मध्य प्रदेश सरकार चिर निंद्रा से जागे!
छतरपुर में ‘चिता आंदोलन’ का आग: केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ आदिवासी महिलाएँ बच्चों समेत चिताओं पर लेटकर बोलीं – “न्याय दो या मौत दो!”

छतरपुर (मध्य प्रदेश)। जब न्याय सो जाता है, तो मासूम बच्चे और बेबस महिलाएँ चिता पर लेटकर उसे जगाने निकल पड़ते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही कई फेसबुक रील्स यही दर्द चीख-चीखकर बता रही हैं। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना के खिलाफ आदिवासी समुदाय का आंदोलन अब चरम पर है। सैकड़ों आदिवासी महिलाएँ अपने नन्हे बच्चों को गोद में लिए प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर और केन नदी के पानी में खड़े होकर ‘पंचतत्व सत्याग्रह’ कर रही हैं। उनका एक ही नारा है – “न्याय दो या मौत दो!”

इन वायरल रील्स में एक तरफ भावुक अपील है – “जब न्याय सो जाता है, तो मासूम बच्चे और बेबस महिलाएँ चिता पर लेटकर उसे जगाने निकल पड़ते हैं”। दूसरी तरफ सीधा सवाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से – “मप्र छतरपुर में हजारों आदिवासी आत्महत्या करने को मजबूर… CM मोहन यादव आँखें खोलो!” तीसरी रील में महिलाएँ पानी में खड़ी होकर कह रही हैं – “पानी में खड़े हैं, पर हौसले बुलंद हैं… हमें न्याय चाहिए!”

आंदोलन की सच्चाई
8 अप्रैल 2026 से शुरू हुआ यह ‘चिता आंदोलन’ (Chita Andolan) अब 11-12 दिन से लगातार जारी था। प्रभावित गांवों के आदिवासी परिवारों का आरोप है कि दौधन (ढोडन) बांध और 221 किलोमीटर लंबी नहर प्रणाली के निर्माण में उनकी पुश्तैनी जमीन, जंगल और आजीविका छीनी जा रही है। उचित मुआवजा नहीं मिल रहा, पुनर्वास का वादा खोखला है, और ग्राम सभा की सहमति भी बिना पूरी जानकारी दिए ली गई थी। प्रदर्शनकारियों ने जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह और चूल्हा बंद जैसी अहिंसक लेकिन दर्द भरी शक्लें अपनाईं।

सरकार का पक्ष vs हकीकत
केन-बेतवा परियोजना (44,605 करोड़ रुपये) बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों में सिंचाई, पेयजल और बिजली देने का वादा करती है। सरकार कहती है कि इससे 8.11 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी, 7 लाख किसान परिवार लाभान्वित होंगे और 44 लाख लोगों को पीने का पानी मिलेगा। लेकिन छतरपुर-पन्ना के आदिवासी पूछ रहे हैं – “विकास के नाम पर हमारी मौत का सिलसिला क्यों?” वे कहते हैं कि मुआवजा महज 12.5 लाख रुपये तक सीमित है, भूमि के बदले भूमि नहीं मिल रही, और विस्थापन के बाद उनकी संस्कृति, जंगल और आजीविका खत्म हो जाएगी।

16 अप्रैल को प्रशासन के कुछ आश्वासनों (10 दिनों में सर्वे) के बाद आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया, लेकिन आदिवासी परिवारों का गुस्सा अभी भी सुलगा हुआ है। वे कह रहे हैं – “अगर हमारी मांगें नहीं मानी गईं तो हमें और चरम रास्ते पर धकेल दिया जाएगा।”

मोहन यादव सरकार के लिए चेतावनी का समय
सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुंच रही ये रील्स अब पूरे देश का ध्यान खींच रही हैं। जब अपनी ही धरती पर जन्मी आदिवासी महिलाएँ बच्चों समेत चिताओं पर लेटकर न्याय मांग रही हों, तब मध्य प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को चिर निद्रा से जागना ही होगा। विकास तभी सही है जब उसमें अंतिम आदिवासी भी शामिल हो।

छतरपुर का यह चिता आंदोलन सिर्फ एक परियोजना का विरोध नहीं, बल्कि न्याय, सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई है। सरकार अगर अभी नहीं जागी तो कल बहुत देर हो जाएगी।

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(सभी वायरल रील्स और मैदानी रिपोर्ट्स पर आधारित)

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