नई दिल्ली — लोकसभा में महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक के पारित न हो पाने के बाद देश की राजनीति में तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों को ठेस पहुंचाने वाला बताया, वहीं विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की जीत करार दिया।
शुक्रवार को सदन में पेश इस महत्वपूर्ण विधेयक को पारित होने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। मतदान के दौरान बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। इस तरह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) आवश्यक समर्थन जुटाने में असफल रहा और विधेयक गिर गया।
प्रधानमंत्री मोदी ने देश के नाम संबोधन में इस घटनाक्रम पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि सरकार ने पूरी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। उन्होंने कहा, “मैं देश की माताओं और बहनों से माफी मांगता हूं। उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाए।” पीएम ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि कुछ दलों के लिए राजनीतिक स्वार्थ देशहित से ऊपर है।
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जैसे दलों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि महिला सशक्तिकरण के इस प्रस्ताव के गिरने पर कुछ विपक्षी दलों का रवैया निराशाजनक रहा। उन्होंने कहा, “देश की करोड़ों महिलाओं की नजर संसद पर थी, लेकिन जब यह प्रस्ताव गिरा तो कुछ दल खुशी मना रहे थे। देश की महिलाएं इसे कभी माफ नहीं करेंगी।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष की राजनीति का खामियाजा देश की नारी शक्ति को उठाना पड़ा है। पीएम ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि “लटकाना, भटकाना और अटकाना” उसकी कार्यशैली रही है और इसी कारण देश को नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने उम्मीद जताई थी कि कांग्रेस इस बार अपने पुराने रुख को बदलते हुए महिलाओं के पक्ष में खड़ी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दूसरी ओर, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण के नाम पर सरकार देश को गुमराह कर रही थी। उनके अनुसार, इस विधेयक के पीछे असली मंशा देश के चुनावी नक्शे को बदलने की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार परिसीमन के जरिए दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर और छोटे राज्यों की राजनीतिक ताकत को कमजोर करना चाहती थी।
राहुल गांधी ने कहा, “सरकार महिलाओं के प्रतिनिधित्व के नाम पर एक ऐसा बिल ला रही थी, जिसके पीछे खतरनाक राजनीतिक इरादे छिपे थे। यह संविधान और संघीय ढांचे पर हमला था।”
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यह परिणाम लोकतंत्र की बड़ी जीत है। उनके मुताबिक, सरकार की मंशा संविधान और संघीय ढांचे को कमजोर करने की थी, जिसे विपक्ष की एकजुटता ने विफल कर दिया।
प्रियंका गांधी ने कहा, “यह सिर्फ महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं था, बल्कि परिसीमन से जुड़ा बड़ा सवाल था। सरकार ऐसे आधार पर परिसीमन करना चाहती थी, जिसमें उसे मनमानी की पूरी छूट मिल जाए।” उन्होंने दावा किया कि विपक्ष की एकता ने पहली बार सरकार को बड़ा झटका दिया है।
उन्होंने आगे कहा कि सरकार इस बिल के जरिए राजनीतिक लाभ लेना चाहती थी। यदि बिल पास हो जाता तो इसे अपनी जीत के रूप में पेश करती, और असफल होने पर विपक्ष को महिला विरोधी बताने की कोशिश करती। उन्होंने इसे “ब्लैक डे” कहे जाने पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह दरअसल लोकतंत्र की जीत का दिन है।
इस पूरे घटनाक्रम ने संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। जहां सत्तापक्ष इसे महिलाओं के अधिकारों पर चोट बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे संविधान और संघीय संतुलन की रक्षा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक प्रतिनिधित्व, परिसीमन और क्षेत्रीय संतुलन जैसे बड़े मुद्दे जुड़े हुए हैं। आने वाले समय में यह विषय देश की राजनीति में प्रमुख बहस का केंद्र बना रह सकता है।
फिलहाल, महिला आरक्षण संशोधन विधेयक का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है, लेकिन इसने यह साफ कर दिया है कि संसद में किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए व्यापक सहमति जरूरी है।