राज्यभर में सरकारी कर्मचारियों के अनिश्चितकालीन आंदोलन का असर अब स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखने लगा है। मंगलवार से शुरू हुए इस आंदोलन के चलते मुंबई के कई प्रमुख सरकारी अस्पतालों में रुग्णसेवा आंशिक रूप से प्रभावित हुई। सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष करने, आश्वासित प्रगति योजना लागू करने, ठेका कर्मचारियों के नियमितीकरण, कैशलेस स्वास्थ्य बीमा और पुरानी पेंशन योजना जैसी मांगों को लेकर कर्मचारी संगठनों ने यह कदम उठाया है।
आंदोलन का असर खासतौर पर शहर के जी.टी. अस्पताल, कामा अस्पताल और सेंट जॉर्ज अस्पताल में देखने को मिला, जहां बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) में मरीजों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई। कुछ निर्धारित सर्जरी भी स्थगित करनी पड़ीं। हालांकि, जे.जे. अस्पताल में स्थिति अपेक्षाकृत सामान्य बनी रही और यहां सेवाएं लगभग नियमित रूप से जारी रहीं।
ठेका कर्मचारियों के सहारे व्यवस्था संभाली गई
कर्मचारियों की कमी के बावजूद मरीजों की देखभाल प्रभावित न हो, इसके लिए अस्पताल प्रशासन ने त्वरित कदम उठाए। स्थायी कर्मचारियों के आंदोलन में शामिल होने के कारण उनकी जगह ठेका कर्मचारियों को तैनात किया गया। आईसीयू, बाल अतिदक्षता इकाई, आपातकालीन विभाग और ओपीडी जैसे संवेदनशील विभागों में इनकी नियुक्ति की गई। साथ ही, नर्सिंग स्टाफ की दो यूनियनों में से एक के आंदोलन में शामिल न होने से नर्सों की कमी ज्यादा नहीं दिखी।
मरीजों की संख्या में उतार-चढ़ाव
जहां कुछ अस्पतालों में मरीजों की संख्या कम रही, वहीं जे.जे. अस्पताल में सामान्य से अधिक मरीज पहुंचे। रोजाना लगभग 1600 मरीजों की तुलना में मंगलवार को यहां करीब 1800 मरीज इलाज के लिए पहुंचे। सेंट जॉर्ज अस्पताल में 241 मरीजों का इलाज हुआ, जिनमें से 26 को भर्ती करना पड़ा। हालांकि, गैर-आपातकालीन सर्जरी टलने से मरीजों को असुविधा का सामना करना पड़ा।
आगे बढ़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आंदोलन लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका व्यापक असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ सकता है। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन संसाधनों पर दबाव बढ़ने के संकेत मिलने लगे हैं।
स्वास्थ्य विभाग का दावा—सेवाएं सुचारू
वहीं, चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग (डीएमईआर) के सह निदेशक डॉ. विवेक पाखमोडे ने स्पष्ट किया कि राज्य के किसी भी अस्पताल में सेवाएं पूरी तरह बाधित नहीं हुई हैं। उनके अनुसार, सभी अस्पतालों में आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं जारी हैं और मरीजों को समुचित उपचार मिल रहा है। कुल मिलाकर, आंदोलन का असर सीमित जरूर है, लेकिन यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो आने वाले दिनों में स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव और बढ़ सकता है।