मुंबई: बारहवीं के नतीजों में जहां कई जूनियर कॉलेज 100 प्रतिशत सफलता का परचम लहराते नजर आए, वहीं मुंबई विभाग के 10 कॉलेजों के लिए यह परिणाम बड़ा झटका लेकर आया। इन संस्थानों को शून्य प्रतिशत रिजल्ट का सामना करना पड़ा है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से तीन कॉलेजों का पूरा परिणाम ही शून्य रहा, जबकि सात कॉलेजों में किसी एक शाखा—चाहे वह विज्ञान हो, कला, वाणिज्य या व्यावसायिक शिक्षा—का एक भी छात्र पास नहीं हो सका।
सबसे ज्यादा असर ठाणे जिले में देखने को मिला, जहां ऐसे मामलों की संख्या सबसे अधिक रही। इसके विपरीत रायगढ़ जिले ने राहत की खबर दी है—यहां एक भी कॉलेज का रिजल्ट शून्य नहीं रहा। मुंबई उपनगर भी इस स्थिति से अछूता रहा, जबकि मुंबई शहर में एक कॉलेज को इस शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा।
शिक्षा जगत में कॉलेज का रिजल्ट उसकी साख और भविष्य तय करता है। बेहतर परिणाम से जहां एडमिशन की दौड़ तेज होती है, वहीं शून्य रिजल्ट किसी भी संस्थान की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाता है। मुंबई विभाग के इन 10 कॉलेजों के लिए यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय बन गई है। सात कॉलेजों में किसी एक विशेष संकाय का रिजल्ट पूरी तरह फेल रहा, जबकि तीन कॉलेज ऐसे रहे जहां एक भी छात्र सफल नहीं हो सका।
ठाणे जिले की बात करें तो यहां एक कॉलेज का पूरा रिजल्ट शून्य रहा, जबकि चार कॉलेजों की कुछ शाखाएं पूरी तरह फेल हो गईं। पालघर जिले में भी यही तस्वीर नजर आई—एक कॉलेज का पूरा रिजल्ट शून्य और चार कॉलेजों की कुछ शाखाएं पूरी तरह असफल रहीं। मुंबई शहर में भी एक कॉलेज इस सूची में शामिल हुआ, जबकि उपनगर और रायगढ़ ने बेहतर प्रदर्शन कर राहत दी।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण छात्रों की बेहद कम संख्या है। कई ऐसे कॉलेज हैं जहां केवल एक या दो छात्र ही परीक्षा में बैठते हैं। ऐसे में यदि वे छात्र फेल हो जाएं, तो पूरे कॉलेज का रिजल्ट शून्य प्रतिशत हो जाता है। इसके उलट, अगर एकमात्र छात्र पास हो जाए तो वही कॉलेज 100 प्रतिशत रिजल्ट हासिल कर लेता है—जो आंकड़ों की सच्चाई को एक अलग नजरिए से दिखाता है।
ठाणे जिले के उदाहरण इस स्थिति को साफ करते हैं। अंबाडी स्थित गुरुकुल विज्ञान और वाणिज्य जूनियर कॉलेज में वाणिज्य शाखा से केवल एक छात्र परीक्षा में बैठा और उसके फेल होने से रिजल्ट शून्य हो गया। पिंपळास के सरस्वती कॉलेज में वाणिज्य शाखा के छात्र पास हुए, लेकिन विज्ञान शाखा में एक छात्र के फेल होने से परिणाम शून्य रहा। न्यू इंग्लिश स्कूल में वाणिज्य शाखा के तीनों छात्र फेल हो गए, जबकि विज्ञान में 10 में से 8 छात्र पास हुए। कल्याण के आर.के. नाइट कॉलेज में वाणिज्य शाखा के दोनों छात्र फेल और कला के दोनों छात्र पास हुए—एक ही कॉलेज में 100 और 0 प्रतिशत का अंतर साफ दिखा।
पालघर में भी यही कहानी दोहराई गई। कई कॉलेजों में एक या कुछ छात्रों के फेल होने से पूरी शाखा का परिणाम शून्य हो गया। मुंबई शहर के प्रियदर्शनी कॉलेज में भी एकमात्र छात्र के फेल होने से पूरा परिणाम शून्य दर्ज किया गया।
कुल मिलाकर, यह आंकड़े केवल परिणाम नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को भी उजागर करते हैं। कम छात्र संख्या, सीमित संसाधन और निगरानी की कमी जैसे कारण इस स्थिति के पीछे अहम माने जा रहे हैं। अब जरूरत है कि ऐसे कॉलेजों पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि आने वाले वर्षों में ‘जीरो रिजल्ट’ की यह तस्वीर बदली जा सके।