बुद्ध पूर्णिमा पर वन्यजीवों की गिनती: येऊर-तुंगारेश्वर में दिखा तेंदुआ, तानसा में 60 से अधिक प्रजातियां दर्ज

ठाणे/शहापुर। बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान और तानसा अभयारण्य में आयोजित वार्षिक वन्यजीव गणना ने इस बार उत्साहजनक तस्वीर पेश की है। येऊर और तुंगारेश्वर के उत्तर व दक्षिण क्षेत्रों में कुल 34 वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज की गई, जिनमें एक तेंदुआ भी शामिल है। वहीं शहापुर स्थित तानसा अभयारण्य में 60 से अधिक प्राणी, पक्षी और सरीसृपों की पहचान की गई है।

हर वर्ष बुद्ध पूर्णिमा के दिन वन विभाग द्वारा यह विशेष गणना अभियान चलाया जाता है, जिसमें वन्यजीवों की वास्तविक स्थिति और उनकी गतिविधियों का आकलन किया जाता है। इस बार भी वन अधिकारियों और कर्मचारियों ने सुनियोजित तरीके से विभिन्न जल स्रोतों और जंगल क्षेत्रों में निगरानी रखकर आंकड़े जुटाए।

येऊर क्षेत्र में साखरोली, केलेचे पाणी, बोरद्याचे पाणी, आघई पाझर तालाब और वेडवहाळ वनमोरी नाला जैसे स्थानों पर मचान बनाकर रातभर निरीक्षण किया गया। इस दौरान तेंदुआ, चीतल, भेकर, जंगली सूअर, नेवला, सांभर और हनुमान लंगूर जैसे वन्यजीवों की उपस्थिति दर्ज की गई। खास बात यह रही कि पिछले वर्ष खराब मौसम के कारण तेंदुआ नजर नहीं आया था, लेकिन इस बार उसकी मौजूदगी ने वन विभाग को राहत दी है।

रात के समय जंगलों में बंदर, लंगूर, चौसिंगा, साही, खरगोश, जंगली बिल्ली, उदबिलाव, गिलहरी और उड़ने वाली गिलहरी जैसे जीवों की आवाजें सुनाई दीं और कई स्थानों पर उनकी गतिविधियां भी देखी गईं। इसके अलावा धामन और घोणस जैसे सांपों के साथ-साथ छिपकली, गिरगिट और मेंढक जैसी प्रजातियों का भी रिकॉर्ड किया गया।

पक्षियों की बात करें तो चित्तीदार वन उल्लू, पिंगला, जंगली पिंगला और गव्हाणी उल्लू की आवाजें रात में सुनाई दीं, जबकि सुबह के समय ब्लैकबर्ड, नीलिमा, नीलमणि, सह्याद्री का सूर्यपक्षी, नीला सूर्यपक्षी, फूलटोचा, काला हळद्या, पावशा, भृंगराज, मोर, सर्पगरुड़, चील, कठफोड़वा और सातभाई जैसे पक्षियों की मौजूदगी दर्ज की गई।

पूरी गणना उपवन संरक्षक राहुल गवई और सहायक वन संरक्षक दत्तात्रेय मिसाल के मार्गदर्शन में संपन्न हुई। अधिकारियों के अनुसार, इस प्रकार की नियमित गणना से वन्यजीवों की संख्या, उनके व्यवहार और संरक्षण की जरूरतों को समझने में मदद मिलती है।

यह आंकड़े न केवल जंगलों में जैव विविधता के संरक्षण का संकेत देते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि ठाणे क्षेत्र के वन्य इलाके अब भी समृद्ध और जीवंत हैं।

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