
वाराणसी। काशी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यहां परंपरा और मस्ती का अनोखा संगम कैसे जीवंत होता है। अप्रैल के मूर्ख दिवस के अवसर पर गंगा घाटों पर आयोजित महामूर्ख सम्मेलन ने हास्य, व्यंग्य और लोक रंग से सराबोर एक यादगार शाम रच दी।
शनिवार गोष्ठी के तत्वावधान में राजेंद्र प्रसाद घाट पर आयोजित इस अनूठे कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग जुटे। वर्षों पुरानी इस परंपरा का यह 58वां आयोजन था, जिसने काशी की मस्तमौला संस्कृति को एक बार फिर जीवंत कर दिया। खास बात यह रही कि इस मंच पर तथाकथित ‘मूर्ख’ और बुद्धिजीवी एक साथ नजर आए और दोनों ने मिलकर समाज को हंसी के आईने में देखने का अवसर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत बेहद रोचक अंदाज में हुई। मंच पर एक कलाकार ने गधे की आवाज निकालकर उद्घाटन किया, जिसे प्रतीकात्मक रूप से ‘मूर्खों का सरताज’ माना गया। इसके बाद बनारसी नगाड़ों की थाप पर कलाकारों ने नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने माहौल को और रंगीन बना दिया।
हास्य का स्तर तब और ऊंचा हो गया जब मंच पर एक विचित्र विवाह का मंचन हुआ। इसमें महिला दूल्हा बनी और पुरुष दुल्हन। अगड़म बगड़म मंत्रों के साथ विवाह संपन्न हुआ और तुरंत बाद एक मौलवी ने उसी जोड़ी का निकाह भी पढ़वा दिया। इस दृश्य में अचानक मोड़ तब आया जब दूल्हा-दुल्हन के बीच नोकझोंक शुरू हुई और मामला काजी के सामने ही तलाक तक पहुंच गया। इस पूरे प्रसंग ने दर्शकों को हंसी से लोटपोट कर दिया।
कार्यक्रम का दूसरा चरण कवि सम्मेलन का रहा, जिसमें देशभर के चर्चित हास्य और व्यंग्य कवियों ने शिरकत की। दमदार बनारसी, सांड बनारसी, सरदार प्रताप फौजदार और धर्मराज उपाध्याय जैसे कवियों ने अपने तीखे व्यंग्य से समकालीन मुद्दों पर कटाक्ष किया। अमेरिका-ईरान तनाव, महंगाई, गैस सिलेंडर और तेल संकट जैसे विषयों को हास्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।
आयोजकों ने कवियों को पारंपरिक उपहार के बजाय गोबर के उपले भेंट कर कार्यक्रम में अलग ही रंग भर दिया। यह प्रतीकात्मक सम्मान भी दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बना रहा।
हजारों की भीड़ के बीच चले इस आयोजन में देर रात तक ठहाकों की गूंज सुनाई देती रही। दर्शकों ने हर प्रस्तुति पर खुलकर आनंद लिया।
इसी दौरान साइबर क्राइम विशेषज्ञ विद्युत सक्सेना ने भी मंच से लोगों को जागरूक किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में सतर्क रहना जरूरी है और छोटी सी लापरवाही भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।
कुल मिलाकर, काशी का यह महामूर्ख सम्मेलन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि समाज को हंसते-हंसाते गंभीर संदेश देने वाला एक जीवंत मंच भी साबित हुआ।