Home ताजा खबररिक्शा टैक्सी ड्राइवर पर भाषा को लेकर दबाव नहीं होना चाहिए, अवसर और शिक्षा जरूरी: अबू आसिम आज़मी

रिक्शा टैक्सी ड्राइवर पर भाषा को लेकर दबाव नहीं होना चाहिए, अवसर और शिक्षा जरूरी: अबू आसिम आज़मी

by trilokvivechana
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मुंबई। भाषा के मुद्दे पर बढ़ती बहस के बीच Abu Asim Azmi ने स्पष्ट कहा है कि देश की विविधता उसकी ताकत है और किसी भी नागरिक पर भाषा थोपना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत के हर राज्य की अपनी अलग भाषाई पहचान है—महाराष्ट्र में मराठी, केरल में मलयालम और असम में असमिया बोली जाती है—ऐसे में किसी एक भाषा को अनिवार्य बनाकर लोगों पर दबाव डालना सही दृष्टिकोण नहीं है।
आज़मी ने कहा कि यदि सरकार मराठी भाषा को बढ़ावा देना चाहती है, तो इसके लिए सकारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि मराठी सीखने के इच्छुक लोगों के लिए किताबें उपलब्ध कराई जाएं, प्रशिक्षण कक्षाएं आयोजित की जाएं और भाषा को सरल तरीके से सिखाने की व्यवस्था की जाए। उनका मानना है कि जागरूकता और सुविधा के माध्यम से भाषा का प्रचार अधिक प्रभावी हो सकता है, बजाय इसके कि लोगों को मजबूर किया जाए।
रोजगार के मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने कहा कि देश में बेरोजगारी पहले से ही एक गंभीर समस्या है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति दूसरे राज्य से मुंबई या महाराष्ट्र आता है, तो उसे आजीविका कमाने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषा के आधार पर रोजगार के अवसरों को सीमित करना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे सामाजिक असंतुलन भी पैदा हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि मराठी भाषा के नाम पर राजनीति करना राज्य की छवि को नुकसान पहुंचाता है। कई बार मराठी न जानने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं, जो चिंता का विषय है। आज़मी के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए जरूरी है कि सरकार समावेशी नीति अपनाए और सभी समुदायों को साथ लेकर चले।
उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य में भाषा सीखने की एक व्यवस्थित प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, ताकि जो लोग मराठी सीखना चाहते हैं, उन्हें सही मार्गदर्शन और संसाधन मिल सकें। साथ ही, उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार के लाइसेंस या परमिट देने से पहले भाषा का ज्ञान सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण देना अधिक व्यावहारिक समाधान हो सकता है।
आज़मी ने अंत में जोर देकर कहा कि महाराष्ट्र की पहचान उसकी बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक परंपरा से है। इसलिए जरूरी है कि भाषा को लेकर संवेदनशीलता और संतुलन बनाए रखा जाए, ताकि विकास और सामाजिक समरसता दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके।

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