Home राजनीतिराज्यउत्तर प्रदेशमुफ्त राशन योजना पर उठे सवाल, कई गांवों में घटतौली की शिकायतें तेज

मुफ्त राशन योजना पर उठे सवाल, कई गांवों में घटतौली की शिकायतें तेज

by trilokvivechana
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प्रयागराज। गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने के उद्देश्य से चलाई जा रही सरकारी मुफ्त राशन योजना अब सवालों के घेरे में आ गई है। सोरांव तहसील के पिपरांव, हरीडीह (होलागढ़) और ककरा गांवों से सामने आई शिकायतों ने वितरण व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि बायोमेट्रिक सत्यापन के बावजूद उन्हें निर्धारित मात्रा से कम राशन दिया जा रहा है।

पिपरांव गांव में कोटेदार रूपा देवी और हरीडीह (इमामकुलीपुर) में सोना देवी पर प्रति यूनिट एक किलो तक राशन कम देने के आरोप लगे हैं। ग्रामीणों ने इस मामले में शिकायत दर्ज कर जांच की मांग की है। वहीं ककरा गांव में जांच के दौरान अनियमितताएं सही पाई गईं, जिसके बाद संबंधित कोटेदार का कोटा निलंबित कर दिया गया। इस कार्रवाई से यह स्पष्ट होता है कि शिकायतें केवल आरोप नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत से जुड़ी हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि बायोमेट्रिक मशीन पर अंगूठा लगाने के बाद भी पूरा राशन नहीं मिलता। कहीं 1–2 किलो तक कम तौल दी जाती है, तो कहीं “आज इतना ही स्टॉक आया है” जैसे बहाने बनाए जाते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तकनीक का उपयोग केवल उपस्थिति दर्ज करने तक सीमित है या फिर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भी जिम्मेदार है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत प्रत्येक पात्र व्यक्ति को प्रति माह 5 किलो और अंत्योदय कार्डधारकों को 35 किलो राशन मिलना उनका कानूनी अधिकार है। इसके बावजूद बार-बार सामने आ रही घटतौली यह संकेत देती है कि निगरानी व्यवस्था में कहीं न कहीं कमी है।

इसी तरह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के अनुसार राशन में कटौती या कम तौल देना अनुचित व्यापार प्रथा की श्रेणी में आता है, जिसके लिए कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। हालांकि जमीनी स्तर पर कार्रवाई की गति अपेक्षाकृत धीमी दिखाई दे रही है, जिससे ग्रामीणों में असंतोष बढ़ रहा है।

इस पूरे प्रकरण ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या निगरानी समितियां केवल कागजों तक सीमित हैं? क्या इलेक्ट्रॉनिक तौल मशीनें सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, गरीबों का हक आखिर किस स्तर पर कट रहा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जांच पर्याप्त नहीं है। नियमित निरीक्षण, सोशल ऑडिट, पारदर्शी वितरण प्रणाली और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई ही इस व्यवस्था में विश्वास बहाल कर सकती है। साथ ही लाभार्थियों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा, ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता के खिलाफ वे आवाज उठा सकें।

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