
मुंबई: राज्य बोर्ड की बारहवीं परीक्षा में एक बार फिर कोकण विभाग ने बाजी मार ली है। लगातार वर्षों से शीर्ष स्थान बनाए रखने वाले इस क्षेत्र ने इस बार भी 94.14 प्रतिशत उत्तीर्णता के साथ अपना दबदबा कायम रखा है। नतीजों के बाद कोकण के विद्यार्थियों की प्रतिभा की चर्चा तेज हो जाती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस सफलता के पीछे एक अहम कारण यहां के छात्रों की कम संख्या भी है।
रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिलों को शामिल करने वाला कोकण विभाग भले ही हर साल परिणामों में आगे रहता है, लेकिन यहां परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों की संख्या अन्य बड़े मंडलों की तुलना में काफी कम है। यही वजह है कि औसत प्रतिशत में यह क्षेत्र बढ़त बना लेता है।
इस वर्ष मुंबई विभाग से सबसे अधिक 3,23,501 छात्र परीक्षा में शामिल हुए। इसके बाद पुणे से 2,41,826 और नागपुर से 1,52,230 छात्र परीक्षा में बैठे। वहीं छत्रपति संभाजीनगर से 1,84,841, नासिक से 1,62,914, अमरावती से 1,48,931, कोल्हापुर से 1,11,482 और लातूर से 91,326 छात्रों ने परीक्षा दी। इन आंकड़ों के मुकाबले कोकण विभाग से केवल 22,888 छात्र ही परीक्षा में शामिल हुए, जो अन्य सभी क्षेत्रों से काफी कम है।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि बड़े शहरों में असफल होने वाले छात्रों की संख्या ही कोकण के कुल परीक्षार्थियों के बराबर है। मुंबई में इस वर्ष 32,086 छात्र फेल हुए, जबकि पुणे में यह संख्या 21,146 रही। दिलचस्प तथ्य यह है कि कोकण से परीक्षा देने वाले कुल छात्रों की संख्या लगभग इन्हीं आंकड़ों के आसपास है। वहीं कोकण में इस वर्ष केवल 1,340 छात्र ही असफल हुए।
विशेषज्ञों का कहना है कि कम संख्या के कारण शिक्षकों और संस्थानों को हर छात्र पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिलता है। कोकण क्षेत्र में कॉलेजों की संख्या भी सीमित है, जिससे कक्षाओं में भीड़ कम रहती है और पढ़ाई पर बेहतर नियंत्रण संभव हो पाता है। यही कारण है कि यहां विद्यार्थियों की तैयारी अधिक व्यवस्थित होती है और परिणाम बेहतर आते हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह सफलता केवल प्रतिभा का परिणाम नहीं बल्कि बेहतर निगरानी, सीमित छात्र संख्या और व्यक्तिगत मार्गदर्शन का संयुक्त असर है। ऐसे में कोकण मॉडल को समझना और अन्य क्षेत्रों में लागू करना शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बना सकता है।
लगातार मिल रही इस सफलता ने कोकण की पहचान एक ‘परिणाम चैंपियन’ क्षेत्र के रूप में मजबूत कर दी है, लेकिन इसके पीछे छिपे कारणों को समझना भी उतना ही जरूरी है, ताकि पूरे राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता को संतुलित रूप से बेहतर बनाया जा सके।