
गैस की बढ़ती लागत का असर, वाहन चालकों और घरेलू उपभोक्ताओं पर बढ़ा बोझ
मुंबई महानगर क्षेत्र के लाखों वाहन चालकों और घरेलू गैस उपभोक्ताओं को एक बार फिर महंगाई का झटका लगा है। महानगर गैस लिमिटेड (एमजीएल) ने शनिवार से कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) और घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (डी-पीएनजी) की कीमतों में बढ़ोतरी की घोषणा की है। नए संशोधन के तहत सीएनजी के दाम में 2 रुपये प्रति किलोग्राम और घरेलू पाइप्ड गैस के दाम में 50 पैसे प्रति स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर की वृद्धि की गई है।
नई दरें लागू होने के बाद मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में सीएनजी की कीमत बढ़कर 86 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई है। वहीं घरेलू उपभोक्ताओं को भी अब रसोई गैस के लिए अधिक भुगतान करना होगा। बढ़ी हुई कीमतों का सीधा असर दैनिक खर्चों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
एमजीएल ने मूल्य वृद्धि के पीछे कई आर्थिक और वैश्विक कारणों का हवाला दिया है। कंपनी के अनुसार घरेलू गैस आवंटन में लगातार कमी आ रही है, जिसके चलते उसे महंगे विकल्पों से गैस खरीदनी पड़ रही है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में तेजी और भारतीय रुपये की कमजोरी ने भी खरीद लागत को प्रभावित किया है। इन परिस्थितियों के कारण कंपनी पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बढ़ा है, जिसका असर उपभोक्ता दरों पर दिखाई दे रहा है।
कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। गैस आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक गैस महंगी हुई है। इसका प्रभाव भारत के शहर गैस वितरण नेटवर्क तक पहुंचा है, जिससे गैस कंपनियों की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
एमजीएल का कहना है कि वह लागत नियंत्रण के विभिन्न उपायों पर काम कर रही है और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ को यथासंभव सीमित रखने का प्रयास किया जा रहा है। कंपनी का दावा है कि प्राकृतिक गैस अब भी अन्य कई ईंधनों की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ और किफायती विकल्प बनी हुई है।
गौरतलब है कि इससे पहले 14 मई 2026 को भी एमजीएल ने सीएनजी के दाम में 2 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी की थी। यानी केवल एक महीने के भीतर सीएनजी कुल 4 रुपये प्रति किलोग्राम महंगी हो चुकी है। लगातार बढ़ती कीमतों ने टैक्सी, ऑटो और निजी वाहन चालकों की चिंता बढ़ा दी है, जबकि घरेलू गैस उपभोक्ताओं को भी मासिक बजट में अतिरिक्त प्रावधान करना पड़ सकता है। ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती लागत का यह असर आने वाले दिनों में आम लोगों की जेब पर और भारी पड़ सकता है।