वाराणसी। गंगा तट की नगरी काशी ने शनिवार को एक अनोखा और विरल दृश्य देखा जब सामान्यतः संध्या बेला में होने वाली प्रसिद्ध गंगा आरती का आयोजन दोपहर के समय ही सम्पन्न किया गया। इसका कारण था चंद्रग्रहण, जिसके चलते धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्धारित सूतक काल आरंभ होने से पूर्व ही अनुष्ठान पूरे कर लिए गए। गंगा सेवा निधि के अध्यक्ष सुशांत मिश्रा ने बताया कि इस बार चंद्रग्रहण का सूतक काल दोपहर 12:57 बजे से प्रारंभ हो गया था। मान्यताओं के अनुसार सूतक काल में कोई भी धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ या आरती नहीं की जाती, इसलिए गंगा आरती को परंपरा के अनुरूप पहले ही पूरा किया गया। दशाश्वमेध घाट पर दोपहर के समय जैसे ही मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि गूंजी, वातावरण श्रद्धा और भक्ति से सराबोर हो उठा।
गंगा सेवा निधि के कोषाध्यक्ष आशीष तिवारी ने कहा कि सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण के समय यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। जब भी ग्रहण लगता है, तो आरती और पूजा पाठ ग्रहण से पूर्व ही संपन्न कर दिए जाते हैं और सूतक काल के दौरान मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसी परंपरा का पालन करते हुए इस बार भी विशेष गंगा आरती दोपहर को कराई गई। इस अनोखी आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। श्रद्धालुओं ने मंत्रोच्चार, दीप प्रज्ज्वलन और मां गंगा की स्तुति में भावपूर्ण स्वर मिलाए। इस अवसर पर घाटों पर दीपों की पंक्तियां और गूंजते शंखनाद ने पूरे वातावरण को अलौकिक बना दिया।
वाराणसी के अन्य प्रमुख घाटों जैसे अस्सी घाट पर भी यह दृश्य देखने को मिला। यहां भी शाम को होने वाली गंगा आरती को सूतक काल से पूर्व ही संपन्न किया गया। श्रद्धालुओं के लिए यह एक नया अनुभव था क्योंकि ज्यादातर लोग गंगा आरती को सूर्यास्त के समय देखने के अभ्यस्त होते हैं। परंतु इस बार बदलती खगोलीय स्थिति और परंपरा के पालन के कारण यह दृश्य दोपहर में देखने को मिला, जिसने इसे और विशेष बना दिया।
चंद्रग्रहण के चलते शहर भर में धार्मिक गतिविधियों में भी बदलाव हुआ। सूतक काल आरंभ होते ही नगर के अधिकांश मंदिरों के कपाट बंद कर दिए गए। परंपरा के अनुसार सूतक काल में देवी-देवताओं के विग्रहों को ढक दिया जाता है और पूजा स्थगित कर दी जाती है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में भी ग्रहण के स्पर्श काल से लगभग ढाई घंटे पूर्व मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए। यह परंपरा इसलिए निभाई जाती है क्योंकि धार्मिक मान्यताओं में ग्रहण काल को अशुभ माना जाता है और इस दौरान पूजा-अर्चना वर्जित रहती है।
दोपहर की इस विशेष गंगा आरती में न केवल स्थानीय श्रद्धालु बल्कि बड़ी संख्या में देश-विदेश से आए पर्यटक भी शामिल हुए। पर्यटकों के लिए यह अनुभव अद्वितीय था, क्योंकि उन्होंने गंगा आरती को आमतौर पर संध्या समय होते देखा था। विदेशी पर्यटकों ने भी इस अवसर को कैमरों में कैद किया और भारतीय धार्मिक परंपराओं की गहराई को करीब से महसूस किया।
काशी के पंडितों और पुरोहितों का मानना है कि ग्रहण काल का पालन धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य है। गंगा सेवा निधि की ओर से किए गए इस आयोजन ने न केवल परंपरा का निर्वाह किया बल्कि यह संदेश भी दिया कि बदलते समय और परिस्थितियों में भी धार्मिक मान्यताओं का पालन कैसे किया जा सकता है। आरती के समय मां गंगा के जयकारों से पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठा और श्रद्धालुओं ने इसे अपने जीवन का अविस्मरणीय क्षण बताया।
ग्रहण समाप्त होने के बाद धार्मिक परंपरा के अनुसार मंदिरों की सफाई और शुद्धिकरण की प्रक्रिया की जाएगी और इसके बाद ही पुनः मंदिरों के कपाट खोले जाएंगे। काशी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र में ऐसे आयोजन न केवल आस्था को बल प्रदान करते हैं बल्कि खगोलीय घटनाओं और धार्मिक परंपराओं के सामंजस्य का अद्भुत उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।
इस प्रकार, 7 सितंबर का दिन काशीवासियों और वहां उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए विशेष बन गया, जब उन्होंने गंगा आरती को एक नए रूप में देखा और अनुभव किया। चंद्रग्रहण के चलते समय से पहले कराई गई इस आरती ने यह साबित कर दिया कि परंपराएं चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हों, वे बदलते समय और परिस्थितियों में भी जीवंत रहती हैं और लोगों को आस्था से जोड़े रखने में सक्षम हैं।
