नई दिल्ली। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के पति मनीष गुप्ता को लेकर एक बार फिर दिल्ली की राजनीति गरमा गई है। मामला उस समय तूल पकड़ गया जब बाढ़ की गंभीर स्थिति के बीच मुख्यमंत्री सचिवालय में आयोजित एक अहम बैठक में मनीष गुप्ता मुख्यमंत्री के बगल वाली सीट पर बैठे दिखाई दिए। बैठक में दिल्ली सरकार के वरिष्ठ अधिकारी और विभागीय प्रमुख मौजूद थे, जो आपात हालात से निपटने की रणनीति तैयार कर रहे थे। इस दौरान ली गई तस्वीर जैसे ही सार्वजनिक हुई, विपक्ष ने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि संवैधानिक गरिमा की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आम आदमी पार्टी ने इस तस्वीर को साझा करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सरकार को ‘फुलेरा की पंचायत’ बना दिया है, जहां उनके पति सीधे तौर पर सत्ता संचालन में शामिल दिखाई दे रहे हैं। आप प्रवक्ता घनेंद्र भारद्वाज ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री से ज्यादा उनके पति ही सरकार चला रहे हैं और अधिकारियों को निर्देशित करने का काम कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब इस तरह से सरकार की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है तो उपराज्यपाल चुप क्यों हैं और उन्होंने अभी तक कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया। विपक्ष का यह भी आरोप है कि मनीष गुप्ता लगातार सरकारी बैठकों में न केवल मौजूद रहते हैं बल्कि खुद को सुपर सीएम की तरह पेश करते हैं।
गौरतलब है कि दिल्ली में इस समय बाढ़ की स्थिति बनी हुई है, जिससे निपटने के लिए तमाम विभाग अलर्ट पर हैं। राजधानी के कई निचले इलाकों में पानी भरने और लोगों के प्रभावित होने की खबरें मिल रही हैं। ऐसे हालात में सरकार की तरफ से लगातार आपात बैठकें बुलाई जा रही हैं ताकि राहत और बचाव कार्य को तेज किया जा सके। इसी कड़ी में सचिवालय की इस बैठक का आयोजन हुआ था। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने विभागीय अधिकारियों से हालात की जानकारी ली और राहत कार्यों की समीक्षा की। लेकिन बैठक में उनके पति की मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में विवाद खड़ा कर दिया। विपक्षी दलों का कहना है कि एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग केवल मुख्यमंत्री को ही करना चाहिए, न कि उनके परिजन को। तस्वीरों में मनीष गुप्ता मुख्यमंत्री के बगल में बैठे नजर आए, जिसे लेकर आरोप लगाए गए कि वे सरकारी निर्णयों पर सीधे तौर पर प्रभाव डालने की कोशिश कर रहे हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब इस तरह का विवाद उठा है। कुछ महीनों पहले भी मुख्यमंत्री के पति की उपस्थिति एक आधिकारिक बैठक में दर्ज की गई थी। तब भी विपक्ष ने यही आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार में परिवारवाद का असर दिख रहा है और मुख्यमंत्री की संवैधानिक भूमिका प्रभावित हो रही है। उस समय सरकार ने सफाई देते हुए कहा था कि मुख्यमंत्री के पति केवल निजी क्षमता में मौजूद थे और उन्होंने किसी सरकारी कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं किया। हालांकि इस बार जब तस्वीरें सामने आई हैं और बैठक बाढ़ जैसी आपात स्थिति को लेकर थी, तो विपक्ष के लिए सरकार पर हमला बोलने का नया मौका मिल गया है।
वहीं, मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से इस पूरे मामले पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। लेकिन सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री की ओर से कहा जा सकता है कि बैठक में पति की मौजूदगी महज संयोग थी और इसका प्रशासनिक निर्णयों से कोई संबंध नहीं था। हालांकि विपक्ष के हमलों और सोशल मीडिया पर बढ़ते विवाद के बीच सरकार के लिए यह मामला संवेदनशील बनता जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब राज्य में संकट की स्थिति हो और लोगों को त्वरित राहत की आवश्यकता हो, तब ऐसे विवाद सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
आम आदमी पार्टी ने इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने का ऐलान किया है और कहा है कि वे इसे विधानसभा से लेकर सड़कों तक उठाएंगे। पार्टी प्रवक्ता ने दोहराया कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही नीति और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं, किसी भी परिजन को इस व्यवस्था में जगह नहीं दी जा सकती। वहीं विपक्ष का यह भी कहना है कि मुख्यमंत्री अपने पति को बार-बार आधिकारिक गतिविधियों में शामिल करके एक गलत परंपरा की शुरुआत कर रही हैं, जिसका असर आने वाले समय में प्रशासनिक कामकाज पर पड़ सकता है।
फिलहाल यह विवाद किस दिशा में जाता है और क्या उपराज्यपाल इस पर कोई कदम उठाते हैं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। लेकिन इतना तय है कि बाढ़ जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में जब सरकार से अपेक्षा थी कि वह केवल राहत कार्यों पर ध्यान केंद्रित करे, उस समय मुख्यमंत्री के पति की मौजूदगी ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। इस विवाद ने न केवल विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का मौका दिया है बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।