Home राजनीतिराज्यमहाराष्ट्रमुंबई पोर्ट ट्रस्ट व महाराष्ट्र शासन के समुद्रीय क्षेत्र में पर्यावरण हनन का पर्दाफाश — एजीस कंपनी की भूमिका पर गंभीर सवाल

मुंबई पोर्ट ट्रस्ट व महाराष्ट्र शासन के समुद्रीय क्षेत्र में पर्यावरण हनन का पर्दाफाश — एजीस कंपनी की भूमिका पर गंभीर सवाल

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मुंबई महानगर के पूर्वी तट पर स्थित माहुल, पिरपाऊ और भाभा क्षेत्र एक बार फिर चर्चा और विवादों के केंद्र में हैं। हाल ही में प्राप्त सरकारी दस्तावेज़ों, पर्यावरणीय रिपोर्टों तथा प्रशासनिक पत्राचारों से यह संकेत स्पष्ट रूप से मिलते हैं कि इस क्षेत्र में रासायनिक टैंकों के निर्माण हेतु समुद्र में की गई भूमि भराई (Sea Filling) न केवल अवैध रूप से की गई है, बल्कि इसके लिए आवश्यक वैधानिक अनुमतियाँ और पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ भी पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं की गईं।

अवैध भूमि भराई और वृक्षों की कटाई का गंभीर मामला

माहुल क्षेत्र के समीप स्थित ट्रेंगुलर प्लॉट, जिसे मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (BPT) ने लीज़ पर Aegis Logistics Ltd. नामक निजी कंपनी को दिया है, उस पर लंबे समय से वृक्षों की अवैध कटाई, भूमि भराई और रासायनिक भंडारण गतिविधियाँ जारी हैं। इन कार्रवाइयों के विरुद्ध स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों द्वारा लगातार शिकायतें की जाती रही हैं। 

“Master Port Plan 2047” के तहत इस क्षेत्र को औद्योगिक एवं लॉजिस्टिक विकास क्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है, किंतु उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार EIA (Environmental Impact Assessment), MPCB Consent, तथा CRZ Clearance जैसी वैधानिक स्वीकृतियों में गंभीर अनियमितताएँ पाई गई हैं। विशेष रूप से, 14 जून 2024 को महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB) द्वारा जारी सहमति-पत्र के पश्चात भी, अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई की विशेषज्ञ समिति ने 5 अगस्त 2024 की अपनी रिपोर्ट में “Land Filling Activity” को लेकर गहरी पर्यावरणीय चिंताएँ दर्ज की थीं। फिर भी, Environmental Clearance अब तक अंतिम रूप से स्वीकृत नहीं हुई है — जो अपने आप में एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

निरीक्षण प्रक्रिया में बाधाएँ और धमकी का माहौल

17 सितंबर 2025 को तहसीलदार कार्यालय, कुर्ला द्वारा शिकायतकर्ताओं को 26 सितंबर 2025 को संयुक्त स्थल निरीक्षण हेतु आमंत्रित किया गया था। किन्तु निरीक्षण के दिन शिकायतकर्ताओं को स्थल में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई, जबकि पूर्व सूचना के अनुसार उनकी उपस्थिति आवश्यक थी। इसी दौरान कुछ अज्ञात व्यक्ति — जो कथित रूप से Aegis Logistics Ltd. से जुड़े बताए जाते हैं — निरीक्षण स्थल पर पहुँचे और शिकायतकर्ताओं को डराने-धमकाने का प्रयास किया।

यह घटना न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्न उठाती है, बल्कि जनहित में कार्यरत नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता उत्पन्न करती है। स्थिति को नियंत्रित करने हेतु अधिकारियों ने तत्काल पंचनामा तैयार कर निरीक्षण स्थगित किया।

अब यह निरीक्षण 6 अक्टूबर 2025 को पुनः आयोजित किया जाना प्रस्तावित है। शिकायतकर्ताओं ने इस बार पुलिस सुरक्षा के साथ पारदर्शी निरीक्षण सुनिश्चित करने का औपचारिक अनुरोध तहसीलदार कार्यालय से किया है।

 उपसभापति अण्णा बनसोडे का हस्तक्षेप — समाधान या औपचारिकता?

स्थानिक विधायक श्रीमती सना मलिक द्वारा उठाए गए इस गंभीर प्रकरण पर महाराष्ट्र विधानसभा के उपसभापति श्री अण्णा बनसोडे ने हस्तक्षेप करते हुए मुंबई पोर्ट ट्रस्ट, Aegis कंपनी तथा वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष बैठक बुलाई। बैठक में उपसभापति महोदय ने स्पष्ट निर्देश दिए कि — “समुद्र में किए गए अवैध भराव को एक माह के भीतर हटाया जाए तथा पर्यावरणीय क्षति की भरपाई सुनिश्चित की जाए।”

यह आदेश कागज़ पर निर्णायक प्रतीत अवश्य होता है, परंतु वास्तविक प्रश्न यह है —क्या समुद्र में डाली गई मिट्टी को वास्तव में हटाया जा सकता है? क्या पिछले तीन वर्षों में इस क्षेत्र ने एक भी बार ज्वार-भाटा (High Tide) का सामना नहीं किया? और यदि किया है, तो क्या इस भराव ने आसपास के मैंग्रोव और तटीय जैवविविधता को पहले से नुकसान नहीं पहुँचाया? यदि इन प्रश्नों के उत्तर “हाँ” में हैं, तो यह आदेश केवल औपचारिकता या जनभावना को शांत करने का प्रयास प्रतीत होता है। फिर भी, यह निर्णय पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में अवश्य देखा जा सकता है।


भूमि स्वामित्व पर बड़ा विवाद — महाराष्ट्र शासन बनाम मुंबई पोर्ट ट्रस्ट

विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह क्षेत्र वास्तव में समुद्र में स्वयं निर्मित (Natural Reclaimed Land) है।

महाराष्ट्र शासन के सन 2022 के शासन निर्णय (GR) के अनुसार, यह भूमि महाराष्ट्र शासन के अधिकार क्षेत्र में आती है।

उस निर्णय के अनुसार — इस क्षेत्र का सर्वेक्षण करना, CTS नंबर प्रदान करना, उसका उपयोग तय करना और स्वामित्व (ताबा) निर्धारित करना — यह सभी अधिकार केवल महाराष्ट्र शासन के पास निहित हैं।

इसके विपरीत, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (BPT) का दावा है कि यह क्षेत्र उनके अधिकार में आता है।

उन्होंने अपने दावे का आधार महाराष्ट्र शासन द्वारा वर्ष 2018 में जारी GR को बनाया है, जिसमें कहा गया है कि एलो गेट से लेकर तटीय सीमा तक का क्षेत्र BPT के अंतर्गत आता है और वहाँ वह “स्पेशल अथॉरिटी” के रूप में कार्य करता है।

किन्तु — उस शासन निर्णय में समुद्र में स्वतः निर्मित नई भूमि को BPT के अधिकार क्षेत्र में शामिल करने का कहीं भी उल्लेख नहीं है।

साथ ही, प्रशासनिक नियम के अनुसार — किसी विषय पर शासन द्वारा जारी नया GR, पुराने GR को स्वतः अधिलिखित (Supersede) कर देता है। अतः, 2022 का शासन निर्णय ही विधिसम्मत और प्रभावी माना जाएगा।

इन तथ्यों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि Aegis कंपनी और BPT अधिकारियों ने मिलकर या तो महाराष्ट्र शासन को गुमराह किया है, अथवा सांठगांठ के माध्यम से यह भूमि Aegis कंपनी को सौंपने का प्रयास जानबूझकर किया गया है।


पर्यावरणीय कानूनों के उल्लंघन पर कार्रवाई केवल “औपचारिकता” बनकर नहीं रहनी चाहिए।

माहुल और पिरपाऊ क्षेत्र के निवासी पहले से ही रासायनिक उत्सर्जन, वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संकटों से जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि औद्योगिक कंपनियाँ और कुछ प्रशासनिक तत्व कानून को अपने हित में मोड़ने लगें, तो यह न केवल जनहित, बल्कि लोकशाही और पर्यावरण — दोनों के साथ अन्याय होगा। “निरीक्षण प्रक्रिया पारदर्शी, सार्वजनिक और पुलिस सुरक्षा के अंतर्गत की जानी चाहिए; अन्यथा पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा।”

मुंबई पोर्ट ट्रस्ट परिसर में घटित यह घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि जब उद्योग, प्रशासन और राजनीति के हित आपस में टकराते हैं, तो सबसे पहले प्रकृति और जनता आहत होती है। अब समय है कि शासन इस प्रकरण में पूर्ण पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और निष्पक्षता के साथ कार्य करे, और उन सभी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करे जिन्होंने पर्यावरणीय कानूनों तथा सार्वजनिक विश्वास — दोनों का उल्लंघन किया है।

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