Home ताजा खबरगैस संकट की मार: गिरगांव का 60 साल पुराना मराठी भोजनालय बंद, छात्रों और नौकरीपेशा लोगों की बढ़ी मुश्किलें

गैस संकट की मार: गिरगांव का 60 साल पुराना मराठी भोजनालय बंद, छात्रों और नौकरीपेशा लोगों की बढ़ी मुश्किलें

by trilokvivechana
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मुंबई : अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी ईरान–इजरायल संघर्ष का असर अब आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी दिखने लगा है। व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की आपूर्ति प्रभावित होने से मुंबई के कई छोटे-बड़े होटल और भोजनालय संकट में आ गए हैं। इसी कड़ी में दक्षिण मुंबई के गिरगांव स्थित करीब 60 वर्ष पुराना एक प्रसिद्ध मराठी भोजनालय भी गैस की कमी के कारण पिछले चार दिनों से बंद पड़ा है। इस अचानक बंदी से वहां नियमित रूप से भोजन करने वाले छात्रों, स्थानीय नागरिकों और नौकरीपेशा लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

गिरगांव का यह पारंपरिक मराठी भोजनालय कभी इलाके की पहचान माना जाता था। इसकी स्थापना कृष्णा महाडिक नरवणकर ने अपने भाइयों के सहयोग से की थी। खानपान की इस परंपरा को उन्होंने दशकों तक जीवित रखा और 92 वर्ष की आयु तक स्वयं प्रतिदिन भोजनालय में उपस्थित रहते थे। वर्ष 2016 के बाद से उनकी बेटियां शमा नरवणकर और विद्या भालचंद्र पाटिल इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। विरार में रहने वाली विद्या सुबह के समय संचालन संभालती हैं, जबकि शमा शाम के समय भोजनालय का प्रबंधन देखती हैं।

इस भोजनालय की खासियत यह है कि यहां घर जैसे स्वाद वाला शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन उपलब्ध होता है। रोज सुबह लगभग 50 से 55 लोग और रात में भी लगभग उतने ही ग्राहक यहां भोजन के लिए आते हैं। आसपास स्थित क्रॉफर्ड मार्केट, मरीन लाइंस, गिरगांव और वी.पी. रोड क्षेत्र के कर्मचारी, पुलिसकर्मी, अस्पताल स्टाफ और बैंकों के अधिकारी यहां नियमित रूप से भोजन करते रहे हैं।

भोजनालय के संचालन के लिए हर तीन दिन में एक व्यावसायिक गैस सिलेंडर की आवश्यकता होती है। सामान्य परिस्थितियों में सिलेंडर बुक करने के दो घंटे के भीतर उपलब्ध हो जाता था, इसलिए यहां गैस का अतिरिक्त भंडारण नहीं रखा जाता था। लेकिन हालिया आपूर्ति संकट के कारण सिलेंडर समय पर नहीं मिल पा रहा है। परिणामस्वरूप 13 मार्च से भोजनालय के चूल्हे ठंडे पड़े हैं।

बताया जाता है कि यहां तैयार होने वाले भोजन में करीब 90 प्रतिशत व्यंजन मांसाहारी और 10 प्रतिशत शाकाहारी होते हैं। शनिवार को बुक किया गया गैस सिलेंडर रविवार दोपहर तक भी नहीं पहुंच पाया, जिसके चलते भोजनालय को बंद रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। इस स्थिति का असर यहां काम करने वाले कर्मचारियों पर भी पड़ा है। आठ कर्मचारियों में से छह अपने पैतृक गांव रत्नागिरी लौट गए हैं।

भोजनालय बंद रहने से अब तक करीब 60 से 65 हजार रुपये का आर्थिक नुकसान हो चुका है। वहीं दक्षिण मुंबई में पढ़ाई या नौकरी के लिए रहने वाले कई छात्र और कर्मचारी सस्ते व घरेलू भोजन के लिए ऐसे भोजनालयों पर ही निर्भर रहते हैं। खानावली के अस्थायी रूप से बंद होने के कारण अब उन्हें बाहर के होटलों में भोजन करना पड़ रहा है, जिससे उनका दैनिक खर्च भी बढ़ गया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल्द ही गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो शहर के कई छोटे भोजनालयों और होटलों पर संकट और गहरा सकता है।

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