
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब केवल वैश्विक राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम लोगों की रसोई और दैनिक खर्च पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ने वाला है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है, जिससे दैनिक उपयोग के सामान बनाने वाली कंपनियों पर दबाव बढ़ गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच साबुन, खाद्य तेल, शैम्पू और अन्य जरूरी उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे माल की कीमतों में यही तेजी बनी रही, तो कंपनियां अपने उत्पादों के दाम 3 से 4 प्रतिशत तक बढ़ा सकती हैं।
फिलहाल कंपनियों के पास 30 से 45 दिनों का पुराना स्टॉक उपलब्ध है, जिससे वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही तक कीमतों में ज्यादा बदलाव नहीं होगा। लेकिन इसके बाद जैसे ही नया स्टॉक बाजार में आएगा, महंगाई का असर साफ नजर आने लगेगा।
आम तौर पर लोग मानते हैं कि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित रहता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा व्यापक है। रोजमर्रा के उत्पादों की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक भी कच्चे तेल से ही तैयार होता है। ऐसे में पैकेजिंग महंगी होने का सीधा असर उत्पादों की कीमत पर पड़ता है, जिसका बोझ आखिरकार उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ता है।
इसके अलावा, तेल महंगा होने से माल ढुलाई की लागत भी बढ़ गई है। जहाजों का किराया और बीमा खर्च बढ़ने से आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव पड़ रहा है। भारत अपने खाद्य तेल का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्ग से आयात करता है, ऐसे में वैश्विक तनाव की स्थिति में आपूर्ति बाधित होने का खतरा भी बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो खाने के तेल की कीमतों में भी तेजी आ सकती है, जिससे रसोई का बजट और बिगड़ सकता है।
कुल मिलाकर, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ने लगा है। आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है, जिससे घरेलू बजट संभालना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।