
नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर हुई लंबी बहस के बाद शुक्रवार को लोकसभा में मतदान हुआ, जिसमें सरकार को अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। सबसे अहम संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक समर्थन के अभाव में पारित नहीं हो पाया, जिससे सरकार को बड़ा झटका लगा है।
गुरुवार से शुरू हुई चर्चा देर रात तक चली और शुक्रवार को भी कई घंटों तक जारी रही। कुल मिलाकर लगभग 21 घंटे चली बहस में 130 सांसदों ने भाग लिया, जिनमें 56 महिला सांसद शामिल थीं। चर्चा के बाद केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने महिला आरक्षण से संबंधित संशोधन विधेयक सदन में पेश किया, जिसके बाद मतदान की प्रक्रिया शुरू हुई।
मतदान के नतीजों के अनुसार, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को कुल 489 वोट मिले, जिनमें से 298 सांसदों ने इसके पक्ष में और 230 सांसदों ने विरोध में मतदान किया। हालांकि, इस विधेयक को पारित करने के लिए 326 वोटों की आवश्यकता थी, जो कि दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा है। आवश्यक संख्या पूरी न होने के कारण यह विधेयक गिर गया।
यह विधेयक लोकसभा की कुल सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखता था, जिसमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटों का प्रावधान किया गया था। इसके अलावा परिसीमन संशोधन विधेयक में जनसंख्या की परिभाषा बदलकर 2011 की जनगणना को आधार बनाने का प्रस्ताव था। तीसरा विधेयक केंद्र शासित प्रदेशों—पुडुचेरी, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर—के कानूनों में संशोधन से संबंधित था, ताकि महिला आरक्षण और परिसीमन की प्रक्रिया लागू की जा सके।
सदन में बहस के दौरान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज रहे। गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी की भाषा और व्यवहार पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उनके भाषण में संसदीय मर्यादा का अभाव दिखाई देता है और असंसदीय शब्दों का प्रयोग किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की भाषा देश देख और सुन रहा है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान के अनुरूप नहीं है।
वहीं, राहुल गांधी ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह विधेयक महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नहीं, बल्कि चुनावी नक्शे को बदलने का प्रयास है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2023 में पारित विधेयक ही वास्तविक महिला आरक्षण कानून था और वर्तमान प्रस्ताव उसके मूल उद्देश्य से भटक गया है।
इन विधेयकों के गिरने के बाद अब सरकार के सामने रणनीतिक और राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सहमति न बन पाना संसद की कार्यप्रणाली और राजनीतिक ध्रुवीकरण दोनों को उजागर करता है। आने वाले समय में सरकार इस विषय पर नए सिरे से प्रयास करती है या नहीं, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।