मुंबई में 12 साल पुराने दुष्कर्म मामले में बड़ा फैसला, सत्र न्यायालय ने साक्ष्यों की कमी के चलते आरोपी को किया बरी

मुंबई। दिंडोशी सेशंस कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 12 वर्ष पुराने सामूहिक दुष्कर्म और POCSO Act से जुड़े मामले में 35 वर्षीय आरोपी को दोषमुक्त करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा, जबकि जांच प्रक्रिया में भी कई गंभीर खामियां सामने आईं। यह आरोपी पिछले दस वर्षों से अधिक समय तक कारावास में रहा था।

यह मामला नवंबर 2014 का है, जब एक विधवा महिला ने अपनी नाबालिग बेटी के साथ कथित दुष्कर्म की शिकायत दर्ज कराई थी। महिला के चार बच्चों में से 11 वर्षीय बेटी ने घटना से पहले निजी अंगों में दर्द की शिकायत की थी, लेकिन हाल ही में किशोरावस्था शुरू होने के कारण परिवार ने इसे सामान्य शारीरिक परिवर्तन मानकर नजरअंदाज कर दिया। बाद में 31 अक्टूबर को जब महिला घर लौटी, तो उसने अपनी बेटी को पड़ोसी के घर पर संदिग्ध परिस्थिति में पाया।

मां के विश्वास में लेने पर बच्ची ने आरोप लगाया कि पड़ोस में रहने वाले कुछ लोगों ने उसे अश्लील सामग्री दिखाई और उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए, साथ ही घटना को गुप्त रखने के लिए धमकाया। इसके बाद पश्चिमी उपनगर के दहिसर पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की गई। मामले में आरोपी ने शुरू से ही खुद को निर्दोष बताते हुए फंसाए जाने का दावा किया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयानों में कई स्तरों पर गंभीर विरोधाभास हैं। पुलिस और मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान आपस में मेल नहीं खाते थे। साथ ही, पीड़िता की सटीक आयु का स्पष्ट प्रमाण भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे मामले की बुनियाद कमजोर पड़ती दिखी।

अदालत ने प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी को भी संदेहास्पद माना। फैसले में कहा गया कि घटना के बाद बिना किसी संतोषजनक कारण के देरी से शिकायत दर्ज कराई गई, जो मामले की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। न्यायालय के अनुसार, यदि किसी गंभीर अपराध की रिपोर्टिंग में अत्यधिक विलंब होता है और उसका कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता, तो इससे मामले के बाद में गढ़े जाने की आशंका उत्पन्न होती है।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों द्वारा दी गई कथित धमकियों को साबित करने में असफल रहा। न ही यह स्पष्ट किया जा सका कि पीड़िता ने इतने लंबे समय तक घटना को सार्वजनिक क्यों नहीं किया। इसके अलावा, अश्लील वीडियो दिखाने के आरोप के समर्थन में कोई तकनीकी साक्ष्य, जैसे मोबाइल डेटा या फॉरेंसिक रिपोर्ट, प्रस्तुत नहीं की गई।

मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर चोट के संकेत मिलने के बावजूद अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल ऐसे संकेतों के आधार पर दुष्कर्म की पुष्टि नहीं की जा सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के गंभीर आरोपों को सिद्ध करने के लिए बहुआयामी, ठोस और संगत साक्ष्य अनिवार्य हैं।

यह फैसला न केवल इस मामले में आरोपी की रिहाई का कारण बना, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। अदालत की टिप्पणियों ने यह संकेत दिया है कि संवेदनशील मामलों में साक्ष्य संकलन, समयबद्ध कार्रवाई और निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है,

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