फरार आरोपी के नाम पर परिजनों को सताना गैरकानूनी: हाईकोर्ट की यूपी पुलिस को कड़ी फटकार


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा—परिवार को परेशान करना संविधान के खिलाफ, पुलिस को दी सख्त चेतावनी

प्रयागराज | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि फरार आरोपी की तलाश के नाम पर उसके परिजनों को प्रताड़ित करना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है। न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त टिप्पणी की और पुलिस को स्पष्ट निर्देश जारी किए।

मामला उस समय सामने आया जब एक याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि पुलिस उसके घर पर बार-बार दबिश दे रही है। इतना ही नहीं, उसे और उसकी पत्नी को लगातार थाने बुलाकर उनके बेटे के ठिकाने के बारे में जानकारी देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता का पुत्र संदीप तोमर दहेज हत्या के मामले में दोषी है और उसकी अपील पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट पहले ही खारिज की जा चुकी है। इसके बावजूद अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी की तलाश के नाम पर परिवार को परेशान करना कानून के दायरे में नहीं आता।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशुतोष कुमार सिंह ने दलील दी कि पुलिस की कार्रवाई न केवल अनावश्यक है, बल्कि उनके मुवक्किल और उसके परिवार की गरिमा और निजता का उल्लंघन भी कर रही है। अदालत ने इन तर्कों को गंभीरता से लेते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी की।

खंडपीठ ने कहा कि “किसी बेटे को त्यागने का कोई प्रमाण पत्र नहीं होता” और इस आधार पर परिवार से जवाबदेही मांगना पूरी तरह अनुचित है। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की पुलिस कार्रवाई ‘ब्रिटिश दौर की पुरानी और असंवैधानिक पद्धति’ की याद दिलाती है, जो आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी को बार-बार थाने बुलाना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। विशेष रूप से निजता और सम्मान के अधिकार को इस तरह की कार्रवाई से ठेस पहुंचती है, जिसे किसी भी हालत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए पुलिस को सख्त निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता और उसके परिवार को किसी भी प्रकार से परेशान न किया जाए। न तो उन्हें थाने बुलाया जाए और न ही उनके घर पर दबिश दी जाए। साथ ही, कानपुर नगर के गुजैनी थाना क्षेत्र के तत्कालीन थाना प्रभारी को भविष्य में ऐसी कार्रवाई से बचने की कड़ी चेतावनी भी दी गई।

कानूनी विशेषज्ञ इस फैसले को एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि यह आदेश पुलिस के लिए स्पष्ट संदेश है कि कानून लागू करते समय भी संवैधानिक सीमाओं का पालन अनिवार्य है।

यह निर्णय न केवल नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि कानून के शासन में किसी निर्दोष को दबाव में लेना या परेशान करना कतई स्वीकार्य नहीं है।

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