मुंबई। चुनावी हलचल थमते ही महंगाई का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में लौट आया है। 1 मई से 19 किलो वाले व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में अचानक हुई भारी बढ़ोतरी ने बाजार और राजनीति दोनों को गरमा दिया है। नई दरों के बाद सिलेंडर की कीमत 3000 रुपये के पार पहुंच गई है, जिससे खासकर छोटे कारोबारियों और होटल उद्योग पर सीधा असर पड़ने की आशंका है।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राऊत ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान आम जनता को राहत का माहौल दिखाया जाता है, लेकिन मतदान समाप्त होते ही कीमतों में अचानक बढ़ोतरी कर दी जाती है। राउत ने आरोप लगाया कि यह एक तय रणनीति के तहत किया जाता है, जिससे जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।
व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडर की कीमत में करीब 993 रुपये की बढ़ोतरी ने खासतौर पर छोटे व्यापारियों, ढाबा संचालकों और रेस्टोरेंट मालिकों की चिंता बढ़ा दी है। इन क्षेत्रों में गैस खर्च पहले ही एक बड़ी लागत होता है, ऐसे में इस बढ़ोतरी से उनके संचालन खर्च में भारी इजाफा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर सीधे तौर पर खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
राउत ने आगे कहा कि महंगाई का यह सिलसिला यहीं नहीं थमेगा। उन्होंने आशंका जताई कि आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है, जिससे परिवहन लागत बढ़ेगी और इसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं तक पहुंचेगा। उन्होंने सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर बताते हुए कहा कि आम नागरिक लगातार महंगाई के दबाव में जी रहा है।
राजनीतिक संदर्भ में उन्होंने पश्चिम बंगाल के हालात का जिक्र करते हुए कहा कि वहां की जनता अपने फैसले से जवाब देगी। साथ ही मुंबई में जमीन से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ महत्वपूर्ण भूखंड निजी हाथों में सौंपे जा रहे हैं, जो जनहित के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि हरित क्षेत्र से जुड़ी जमीन के उपयोग में पारदर्शिता और जिम्मेदारी बेहद जरूरी है। संजय राउत ने चेतावनी दी कि यदि महंगाई पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया, तो आम लोगों के लिए दैनिक जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा। उन्होंने कहा कि बढ़ती लागत का सबसे बड़ा बोझ छोटे व्यवसायों पर पड़ेगा, जिससे सेवाओं और वस्तुओं की कीमतें और बढ़ सकती हैं। फिलहाल एलपीजी कीमतों में हुई इस बढ़ोतरी ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में महंगाई का मुद्दा एक बार फिर सियासी विमर्श के केंद्र में रहने की संभावना है।