
तीन दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष एक साथ मैदान में, अमित शाह की मौजूदगी से बढ़ा राजनीतिक महत्व
बिहार की राजनीति में गुरुवार का दिन एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के रूप में दर्ज हो गया। राज्य के संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब तीन अलग-अलग राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों ने एक साथ राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया। इस मौके पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री Amit Shah की मौजूदगी ने इस पूरे घटनाक्रम को और भी राजनीतिक महत्व दे दिया।
राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने वाले प्रमुख नेताओं में Nitish Kumar, Nitin Nabin और Upendra Kushwaha शामिल रहे। तीनों नेताओं का एक साथ विधानसभा पहुंचकर नामांकन दाखिल करना सत्तारूढ़ गठबंधन की एकजुटता का मजबूत संदेश माना जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यह रहा कि बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष Nitish Kumar ने राज्यसभा सदस्य के रूप में अपनी उम्मीदवारी पेश की। लंबे समय से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से हटकर दिल्ली की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का संकेत दिया है।
दो दशक बाद नई राजनीतिक पारी
करीब दो दशकों से बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे Nitish Kumar अब नई राजनीतिक पारी की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने अपने 1 मार्च को मनाए गए 75वें जन्मदिन के कुछ दिन बाद राज्यसभा जाने की घोषणा की थी। नामांकन दाखिल करने से पहले उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि संसदीय जीवन की शुरुआत से ही उनकी इच्छा थी कि वे बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ-साथ संसद के दोनों सदनों के सदस्य बनें। इसी उद्देश्य से उन्होंने राज्यसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है।
राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान 16 मार्च को प्रस्तावित है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सांसद बनने के बाद Nitish Kumar मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं और सक्रिय रूप से राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में बिहार में नई सरकार के गठन और नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएं तेज हो गई हैं।
नए मुख्यमंत्री को लेकर अटकलें तेज
नीतीश कुमार के संभावित इस्तीफे के बाद राज्य की राजनीति में नए समीकरण बनने की चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि अगला मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी से हो सकता है। हालांकि इस बारे में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सत्ता संतुलन को लेकर कई तरह की चर्चाएं तेज हैं।
महिला सशक्तिकरण से विकास तक, लंबा रहा कार्यकाल
मुख्यमंत्री के रूप में अपने दो दशक से अधिक लंबे कार्यकाल में Nitish Kumar ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। विशेष रूप से महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में उनके कदमों को उल्लेखनीय माना जाता है। वर्ष 2006 में उन्होंने बिहार की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। बाद में यही व्यवस्था नगर निकाय चुनावों में भी लागू की गई, जिससे ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू की गई मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना और पोशाक योजना ने भी व्यापक प्रभाव डाला। इन योजनाओं के तहत छात्राओं को साइकिल खरीदने के लिए सीधे बैंक खाते में राशि दी जाती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में मैट्रिक परीक्षा में लड़कों और लड़कियों की भागीदारी लगभग बराबर हो गई।
उपलब्धियों के साथ विवाद भी
साल 2016 में नीतीश सरकार ने राज्य में शराबबंदी लागू कर पूरे बिहार में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। इस फैसले को सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि शराब माफिया के कारण अवैध कारोबार जारी है। इसके अलावा बालू के अवैध खनन और परिवहन का मुद्दा भी समय-समय पर राजनीतिक बहस का विषय बना रहा।
क्या बदल जाएगा बिहार का राजनीतिक समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से बिहार की राजनीति में एक बड़े दौर का अंत हो सकता है। पिछले लगभग दो दशकों से राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाले नीतीश कुमार के इस फैसले ने कई नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल राजनीतिक संक्रमण है या इसके पीछे कोई बड़ा रणनीतिक समीकरण काम कर रहा है। आने वाले दिनों में राज्यसभा चुनाव और उसके बाद होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम बिहार की राजनीति की दिशा तय करेंगे।