
मुंबई। मंत्रालय में बढ़ती भीड़ पर नियंत्रण के नाम पर महायुति सरकार का नया आदेश अब बड़े राजनीतिक विवाद का कारण बनता जा रहा है। प्रशासनिक अनुशासन के तौर पर पेश किए गए इस फैसले को विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषक ‘नो एक्सेस’ नीति करार दे रहे हैं, जिससे सत्ता और जनता के बीच दूरी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
सरकार द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार अब मंत्रिमंडल की बैठकों के दौरान किसी भी मंत्री के साथ केवल एक अधिकृत व्यक्ति को ही प्रवेश की अनुमति होगी। इसके अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति को बैठक स्थल तक पहुंचने के लिए मुख्यमंत्री की पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी गई है। बिना अनुमति के प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। इस फैसले का उद्देश्य मंत्रालय में अनावश्यक भीड़ को कम करना और प्रशासनिक कार्यों को सुचारू बनाना बताया गया है।
सूत्रों के अनुसार मंत्रालय की छठी और सातवीं मंजिल पर अक्सर कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और निजी सहायकों की भारी भीड़ रहती थी, जिससे अधिकारियों के कामकाज और फाइलों की आवाजाही प्रभावित होती थी। इसी पृष्ठभूमि में मुख्य सचिव द्वारा सख्त नियम लागू किए गए हैं। अब कैबिनेट हॉल तक केवल अधिकृत व्यक्तियों को ही जाने दिया जाएगा, जबकि अन्य सभी को बाहर ही रोक दिया जाएगा।
नए नियमों में ‘सह्याद्री’ अतिथि गृह के लिए भी अलग प्रावधान किए गए हैं। यहां होने वाली बैठकों में केवल विधायक और सांसदों को ही वेटिंग रूम में बैठने की अनुमति होगी। उनके निजी सहायकों को परिसर में प्रवेश नहीं मिलेगा। इतना ही नहीं, मंत्रिमंडल बैठक के पहले और बाद के दो घंटे तक मंत्रालय में किसी भी अन्य बैठक पर भी रोक लगा दी गई है, ताकि प्रशासनिक कामकाज बिना किसी व्यवधान के पूरा हो सके।
हालांकि, सरकार के इस कदम ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि यह फैसला प्रशासनिक सुधार के बजाय आम जनता और कार्यकर्ताओं की पहुंच को सीमित करने की कोशिश है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता और उनके प्रतिनिधियों के बीच सीधा संवाद बेहद जरूरी होता है, लेकिन इस तरह के प्रतिबंध उस संवाद को कमजोर कर सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का भी मानना है कि पहले ही आम लोगों के लिए मंत्रियों तक पहुंच आसान नहीं थी, और अब नए नियमों के बाद यह और भी कठिन हो जाएगी। इससे जनता की समस्याओं के समाधान में देरी हो सकती है और सरकार के प्रति असंतोष बढ़ने का खतरा भी है।
वहीं, सरकार अपने फैसले पर कायम है और इसे प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है। सरकार का कहना है कि भीड़ नियंत्रण के बिना प्रभावी शासन संभव नहीं है और यह व्यवस्था कामकाज को गति देने में मदद करेगी।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह फैसला वास्तव में प्रशासनिक सुधार साबित होगा या फिर यह जनता और सत्ता के बीच बढ़ती दूरी का कारण बनेगा। फिलहाल, यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों में गर्म बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर और तीखी बहस देखने को मिल सकती है।