वाराणसी। वाराणसी की पावन धरती पर शुक्रवार को श्रद्धा, भक्ति और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब तेज मूसलाधार बारिश के बावजूद नाटी इमली का विश्वप्रसिद्ध भरत मिलाप संपन्न हुआ। काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का यह जीवंत प्रतीक हर वर्ष दशहरा के अगले दिन एकादशी को चित्रकूट रामलीला समिति द्वारा आयोजित किया जाता है। इस वर्ष भी जब सुबह से ही आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट और मूसलाधार वर्षा का दौर जारी था, तब भी काशीवासी और दूर-दूर से आए श्रद्धालु छाता, रेनकोट और कपड़ों से खुद को ढककर भरत मिलाप मैदान में उमड़ पड़े। काशी की पहचान “सात वार नौ त्योहार” इस दृश्य में साक्षात दिखाई दी, जब आस्था ने मौसम को भी मात दे दी।
नाटी इमली के भरत मिलाप की यह परंपरा लगभग पांच सदियों पुरानी है, जिसकी शुरुआत 1796 में काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह के समय से मानी जाती है। तब से लेकर आज तक यह परंपरा निरंतर निभाई जा रही है और इस बार इसका 482वां आयोजन संपन्न हुआ। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और भक्त हनुमान का रूप धारण किए कलाकार पुष्पक विमान पर सवार होकर लंका विजय के बाद नाटी इमली पहुंचे, जहां अयोध्या से भरत और शत्रुघ्न भी अपने दल के साथ उपस्थित हुए। कुछ ही देर में मंचन क्षेत्र, जिसे भरत मिलाप का चबूतरा कहा जाता है, भक्तों की जयघोष से गूंज उठा।
मौसम की प्रतिकूलता के बावजूद आयोजन में कोई बाधा नहीं आई। दोपहर से ही श्रद्धालु मैदान में पहुंचने लगे थे और जब भगवान श्रीराम का रथ भरत मिलाप स्थल पर पहुंचा, तो चारों ओर छाते लहराते हुए दिखाई दिए। बारिश थमने के कोई संकेत नहीं थे, परंतु श्रद्धा की भीगती भीड़ के चेहरे पर भक्ति और उत्साह की चमक स्पष्ट झलक रही थी। ठीक समयानुसार शाम 4 बजकर 40 मिनट पर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण रथ से उतरकर भरत और शत्रुघ्न की ओर दौड़े और उन्हें गले लगा लिया। तीन मिनट की इस लीला के दृश्य ने वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं की आंखें नम कर दीं। पूरा मैदान “हर हर महादेव” और “सियावर रामचंद्र की जय” के जयघोष से गूंज उठा।
चित्रकूट रामलीला समिति के अध्यक्ष और भरत मिलाप के व्यवस्थापक ने बताया कि इस आयोजन की प्रेरणा मेघा भगत को एक स्वप्न में मिली थी, जिसमें भगवान श्रीराम ने उन्हें यहां भरत मिलाप कराने का आदेश दिया था। तभी से इस परंपरा की नींव पड़ी और हर वर्ष इसे नाटी इमली में बड़ी श्रद्धा से निभाया जाता है। मान्यता है कि इस लीला में भगवान श्रीराम स्वयं उपस्थित होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। इस वर्ष भी मेघा भगत द्वारा स्थापित इस परंपरा को यादव बंधुओं ने आगे बढ़ाया और भगवान श्रीराम का पुष्पक विमान लेकर भरत मिलाप स्थल से अयोध्या तक पहुंचाया। उनका पारंपरिक गणवेश और अनुशासित आचरण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा।
काशी की सांस्कृतिक धरोहरों में नाटी इमली का भरत मिलाप एक विशेष स्थान रखता है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज में भाईचारे, प्रेम, निष्ठा और आदर्श जीवन के संदेश को जीवंत करने वाली परंपरा है। यह लीला उस क्षण का प्रतीक है जब भगवान श्रीराम, 14 वर्ष के वनवास के बाद, अयोध्या लौटते हैं और अपने छोटे भाई भरत से मिलते हैं, जिसने सत्ता का त्याग कर अपने बड़े भाई के लौटने की प्रतीक्षा की थी। यह मिलन समर्पण, कर्तव्य और प्रेम की परम अभिव्यक्ति माना जाता है, और काशी में इसका मंचन श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव का रूप ले लेता है।
हर वर्ष की तरह इस बार भी काशी राज परिवार ने इस पावन परंपरा की उपस्थिति दर्ज कराई। डॉक्टर अनंत नारायण सिंह, जो वर्तमान काशी नरेश हैं, वर्षा के कारण इस बार हाथी पर नहीं, बल्कि चार पहिया वाहन से स्थल पर पहुंचे। उन्होंने परंपरागत रीति से लीला का दर्शन किया और आयोजकों को सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं दीं। पिछले 228 वर्षों से काशी राज परिवार इस आयोजन में शामिल होता आ रहा है, जिससे यह परंपरा निरंतर जीवित बनी हुई है।
भारी बारिश के बावजूद सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। पुलिस और प्रशासन की टीम ने यातायात और भीड़ नियंत्रण में सहयोग दिया। महिला श्रद्धालुओं और बच्चों के लिए अलग से स्थान निर्धारित किया गया था। मैदान में कच्चे रास्तों पर कीचड़ भरने के बावजूद लोग बिना हिचकिचाहट वहां पहुंचे और लीला के दर्शन किए। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि आस्था किसी मौसम या परिस्थिति की मोहताज नहीं होती।
स्थानीय नागरिकों ने बताया कि नाटी इमली का भरत मिलाप केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की आत्मा से जुड़ा पर्व है। हर वर्ष इसके माध्यम से समाज में प्रेम, त्याग और पारिवारिक एकता का संदेश फैलता है। इसके अलावा यह आयोजन काशी की सांस्कृतिक पहचान को भी सशक्त बनाता है, जो सदियों से धार्मिक सद्भाव और अध्यात्म की नगरी के रूप में जानी जाती है।
इस वर्ष के आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं ने कहा कि बारिश ने भले ही उन्हें भिगो दिया हो, लेकिन श्रीराम-भरत के मिलन का वह क्षण उनके लिए अविस्मरणीय बन गया। जैसे ही भगवान श्रीराम ने भरत को गले लगाया, वैसे ही पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। कहा जाता है कि जब यह लीला होती है, तब काशी के आकाश में भगवान स्वयं उपस्थित रहते हैं। इस विश्वास ने ही हर वर्ष हजारों लोगों को यहां खींच लाया है।
अंततः इस वर्ष का भरत मिलाप भीगती काशी की धरती पर भावनाओं के सागर में डूबा हुआ संपन्न हुआ। श्रद्धालुओं की आस्था ने प्रकृति की हर चुनौती को पार किया और परंपरा एक बार फिर सजीव बनी रही। नाटी इमली का यह भरत मिलाप इस बात का प्रतीक बन गया कि काशी की संस्कृति केवल रीति-रिवाजों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में बसती है, जो हर परिस्थिति में अपनी परंपराओं को निभाने के लिए संकल्पित रहते हैं। यही कारण है कि चाहे बारिश हो या धूप, नाटी इमली का भरत मिलाप हर बार उसी गरिमा और भक्ति के साथ संपन्न होता है, जैसे सदियों पहले हुआ करता था।
