मुंबई। शहर की बंद पड़ी मिलों के कारण वर्षों से उपेक्षा का शिकार हो रहे मिल मजदूरों की आवाज़ एक बार फिर बुलंद हुई। चिंचपोकली में आयोजित एक कार्यक्रम में कामगार नेता अनिल गणाचार्य ने मिल मजदूरों के हक की लड़ाई पर जोर देते हुए कहा कि “मिल मजदूरों को उनका घर मिलना ही चाहिए।” यह कार्यक्रम कामरेड गुलाबराव गणाचार्य की 52वीं स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था।
गणाचार्य ने कहा कि मिलें बंद होने के बाद कामगारों का जीवन पूरी तरह बिखर गया है। सरकार और प्रशासन से न्याय पाने के लिए वे लगातार भटकते रहे हैं। उन्होंने बताया कि डेढ़ लाख मिल कामगारों ने सरकार से आवास की मांग की थी, लेकिन उनमें से केवल 15 हजार मजदूरों को ही घर मिल सका। यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि वर्षोें से संघर्ष कर रहे इन कामगारों की मांगों को उचित प्राथमिकता नहीं दी गई। गणाचार्य ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि “मिल मालिक बिल्डरों के साथ मिलकर मजदूरों के हक छीने जाने का प्रयास कर रहे हैं। गरीब मजदूरों की सुनने वाला कोई नहीं है।”
अपने भाषण में उन्होंने कामरेड गुलाबराव गणाचार्य के योगदान को याद करते हुए कहा कि साने गुरुजी के शिष्य गुलाबराव ने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अरुणा आसफ अली के साथ सक्रिय रहे। इसके अलावा गोवा मुक्ति आंदोलन और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कार्यक्रम में उपस्थित बेस्ट कामगार नेता और पूर्व नगरसेवक सुनील गणाचार्य ने बताया कि गुलाबराव गणाचार्य 1957 और 1963 में नगरसेवक चुने गए और दो वर्ष तक मुंबई मनपा में विपक्ष के नेता भी रहे। उन्होंने मिल मजदूरों के मुद्दों को राजनीति के केंद्र में लाने का कार्य किया था।
इस अवसर पर स्थानीय नगरसेवक लोखंडे, कां. अशोक कुट्टी, कां. बाबा सावंत, कम्युनिस्ट महिला फेडरेशन की अध्यक्ष श्रीमती अनुराधा रेड्डी, मुंबई मिल कामगार यूनियन के एडवोकेट निंबालकर और विभिन्न दलों के अन्य नेता उपस्थित थे। कार्यक्रम के अंत में “कां. गणाचार्य अमर रहें” के नारे लगाए गए और मिल मजदूरों के संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया गया।
