
चंद्रपुर के रोशन कुडे की गुहार से मचा हड़कंप, अवैध साहूकारी पर सवाल
मुंबई/चंद्रपुर। महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले से एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां नागभीड़ तालुका के मिंथूर गांव के किसान रोशन कुडे ने साहूकारों के अत्याचार से तंग आकर पहले अपनी किडनी बेच दी और अब न्याय न मिलने पर सरकार से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है। इस घटना ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि अवैध साहूकारी के बढ़ते जाल को भी उजागर कर दिया है।
रोशन कुडे की कहानी एक सामान्य कर्ज से शुरू होकर त्रासदी में बदल गई। उन्होंने करीब एक लाख रुपये का कर्ज लिया था, लेकिन साहूकारों के चक्रव्यूह में फंसकर यह रकम ब्याज दर ब्याज बढ़ती गई। परिवार के अनुसार, कुडे अब तक लगभग 74 लाख रुपये चुका चुके हैं, इसके बावजूद उनका कर्ज खत्म नहीं हुआ। लगातार बढ़ती मांग, मानसिक प्रताड़ना और दबाव के चलते उन्होंने एक बेहद कठोर कदम उठाया—कंबोडिया जाकर अपनी किडनी बेच दी।
हैरानी की बात यह है कि किडनी बेचने से मिली रकम देने के बाद भी उनका कर्ज समाप्त नहीं हुआ। उल्टा साहूकारों ने उनकी कृषि भूमि पर कब्जा कर लिया, जिससे उनकी आजीविका का एकमात्र साधन भी छिन गया। आज कुडे और उनका परिवार आर्थिक और मानसिक संकट के गहरे दौर से गुजर रहा है।
न्याय की आस में पिछले चार महीनों से रोशन कुडे जिला प्रशासन और पुलिस विभाग के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। राज्य के बजट सत्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अवैध साहूकारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और उनकी संपत्ति जब्त करने के निर्देश दिए थे। इस घोषणा से कुडे को उम्मीद जगी थी, लेकिन डेढ़ महीने बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस हैं।
हताश और निराश कुडे ने अब जिलाधिकारी को पत्र देकर इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द न्याय नहीं मिला तो वह मंत्रालय के सामने आत्मदाह जैसा कठोर कदम उठाने को मजबूर होंगे।
कुडे के पिता शिवदास कुडे ने बताया कि कोरोना काल में दूध का व्यवसाय ठप हो गया और इसके बाद लंपी रोग के कारण आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई। इसी बीच साहूकारों ने उन्हें अपने जाल में फंसाया और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ाते रहे। परिवार का कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में फैल रहे अवैध साहूकारी के नेटवर्क की भयावह सच्चाई है।
रोशन कुडे का कहना है, “मैंने सब कुछ खो दिया है। मेरी जमीन चली गई, आमदनी का कोई साधन नहीं बचा। मेरे पिता दिव्यांग हैं। अब जीने की कोई राह नहीं दिख रही। अगर मुझे न्याय नहीं मिल सकता, तो मुझे इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।”
इस पूरे मामले ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकार किसान कल्याण और राहत योजनाओं की घोषणा कर रही है, वहीं दूसरी ओर एक किसान न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है।
अब पूरे जिले की नजर प्रशासन के अगले कदम पर टिकी है। क्या सरकार और प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप कर इस किसान को न्याय दिला पाएंगे, या फिर यह मामला एक और दुखद अंत की ओर बढ़ेगा—यह आने वाला समय ही तय करेगा।