Home ताजा खबरमीडिया समाज की सोच गढ़ता है, महिलाओं पर रिपोर्टिंग में संवेदनशीलता जरूरी-विजया रहाटकर

मीडिया समाज की सोच गढ़ता है, महिलाओं पर रिपोर्टिंग में संवेदनशीलता जरूरी-विजया रहाटकर

by trilokvivechana
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मुंबई। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने मीडिया की भूमिका को अत्यंत प्रभावशाली बताते हुए कहा कि यह केवल खबरें देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सोच और दृष्टिकोण को आकार देने वाली शक्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग में संवेदनशीलता, सटीकता और जिम्मेदारी सर्वोपरि होनी चाहिए।
वे मुंबई के यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान में आयोजित “महिला, मीडिया और तकनीक” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रही थीं। इस कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय महिला आयोग और महाराष्ट्र सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क महासंचालनालय द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। कार्यक्रम में प्रधान सचिव एवं महासंचालक ब्रिजेश सिंह, सदस्य सचिव नंदिनी आवडे, वरिष्ठ पत्रकार स्वाती गुप्ता और लेखिका ऋचा सूद सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।
रहाटकर ने कहा कि आज महिलाएं विज्ञान, तकनीक, रक्षा, प्रशासन और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कई सामाजिक और व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह इन मुद्दों को संतुलित और संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करे।
उन्होंने डिजिटल दौर में तेजी से फैलती खबरों पर चिंता जताते हुए कहा कि “पहले खबर देना महत्वपूर्ण है, लेकिन सही खबर देना उससे कहीं अधिक जरूरी है।” फर्जी और भ्रामक सूचनाओं के बढ़ते खतरे को देखते हुए उन्होंने तथ्य-जांच को अनिवार्य बताया।
महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग पर विशेष टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि पीड़िता की गरिमा हर हाल में सुरक्षित रहनी चाहिए। किसी भी स्थिति में उसकी पहचान उजागर करना न केवल अनैतिक है, बल्कि कानूनन भी गलत है। उन्होंने पत्रकारों से लिंग-संवेदनशील भाषा अपनाने और संबंधित कानूनों की जानकारी रखने का आग्रह किया।
रहाटकर ने यह भी कहा कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को केवल अपराध तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें सामाजिक, आर्थिक और नीतिगत संदर्भों में भी उठाना जरूरी है। मीडिया ट्रायल से बचते हुए न्याय प्रक्रिया का सम्मान करना भी उतना ही अहम है।
उन्होंने वंचित वर्ग की महिलाओं की आवाज को मुख्यधारा में लाने और उनकी सफलता व संघर्ष की कहानियों को प्रमुखता देने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यशाला में यह भी रेखांकित किया गया कि हाल के वर्षों में मीडिया में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं, जैसे पीड़िताओं की पहचान गोपनीय रखना और महिला मुद्दों पर गंभीर कवरेज बढ़ना।

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